भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 2014 के बाद का समय एक बड़े 'पैराडाइम शिफ्ट' (वैचारिक बदलाव) का गवाह रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिस चुनावी मशीनरी और रणनीति का विकास किया है, उसने न केवल उसे सत्ता के शिखर पर पहुंचाया, बल्कि पारंपरिक विपक्षी राजनीति की जड़ों को भी हिलाकर रख दिया है। आज सवाल यह नहीं है कि भाजपा चुनाव कैसे जीतती है, बल्कि सवाल यह है कि क्या विपक्ष उसके सामने टिक पाने की क्षमता खो रहा है? और कैसे देशभर के क्षेत्रीय दल बीजेपी के सामने दम तोड़ते नजर आ रहे हैं।
बीजेपी के सामने सिमटते नेता और दल : हाल ही में जिन नेताओं के राजनीतिक कॅरियर पर एक तरह से विराम लगा है उनमें पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी हैं। जिनका किला हाल ही में ढहता नजर आ रहा है। बिहार में नीतीश कुमार लगभग खत्म हो चुके हैं। वहीं लालू यादव की विरासत संभालने वाले तेजस्वी यादव भी कुछ खास कर नहीं पाए हैं। ओडिशा में नवीन पटनायक की राजनीति तकरीबन खत्म हो चुकी है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल फिलहाल उबरने की स्थिति में नहीं है, राघव चड्ढा समेत 6 सांसदों की हाल ही में बीजेपी में एंट्री ने पंजाब को भी खतरे में डाल दिया है। महाराष्ट्र में शिवसेना की स्थिति कोई खास नहीं है।
लेकिन ब
ड़ी
पार्टियां कभी खत्म नहीं होंगी : हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों और राजनीतिक बीट कवर करने वाले पत्रकारों का मानना है कि बड़ी पार्टियां कभी खत्म नहीं होगी। कांग्रेस के नेता आज भी किसी न किसी राज्य में सक्रिय हैं। उनका कहना है कि बल्कि यह कांग्रेस के मजबूत होने की प्रक्रिया का दौर है, क्योंकि अगर क्षेत्रीय दल खत्म होंगे तो बीजेपी के सामने कांग्रेस उबरकर आएगी। क्योंकि जनता को बीजेपी के सामने कोई न कोई विकल्प चाहिए ही होगा। ऐसे में क्षेत्रीय दलों का एक तरफ से सिमटना बीजेपी के लिए भी आगे चलकर घातक साबित होगा।
क्षेत्रीय दलों के साथ क्यों हो रहा ऐसा : भारतीय राजनीति, जो कभी 'गठबंधन युग' (1989-2014) के सहारे चलती थी, अब 'प्रबल रूप से एक-दलीय व्यवस्था' की ओर मुड़ने लगी है। भाजपा की आक्रामक विस्तारवादी रणनीति ने उन क्षेत्रीय दलों को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है, जो दशकों से अपने राज्यों के निर्विवाद सुल्तान रहे थे।
नैरेटिव की कमी: विपक्ष अक्सर 'भाजपा विरोध' को ही अपना मुख्य मुद्दा बनाता है, लेकिन वह जनता को यह समझाने में विफल रहता है कि उनके पास देश के लिए 'वैकल्पिक विजन' क्या है। विपक्ष के कमजोर होने के पीछे केवल भाजपा की मजबूती ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी कुछ आंतरिक कमियां भी हैं।
भाजपा की
'क्षेत्रीय' घेराबंदी: रणनीति के मुख्य बिंदु
भाजपा ने क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने के लिए त्रि-स्तरीय रणनीति अपनाई है:
जातिवाद पर हिंदुत्व की बढ़त: क्षेत्रीय दल अक्सर 'मंडल' (जाति आधारित) राजनीति पर टिके थे। भाजपा ने 'कमंडल' (हिंदुत्व) और 'सबका साथ, सबका विकास' के जरिए जातियों को एक बड़े धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान के नीचे संगठित कर दिया, जिससे क्षेत्रीय दलों का पारंपरिक 'जातिगत वोट बैंक' दरक गया।
नेतृत्व का
'राष्ट्रीयकरण': भाजपा ने विधानसभा चुनावों को भी प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर लड़कर उसे 'राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय' बना दिया है। जनता अब राज्य स्तर पर भी एक 'मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व' को प्राथमिकता देने लगी है।
संगठनात्मक पैठ: भाजपा केवल चुनावों के समय सक्रिय नहीं होती। वह क्षेत्रीय दलों के असंतुष्ट नेताओं को अपने साथ जोड़कर और जमीनी स्तर पर आरएसएस (RSS) के कैडर का उपयोग कर क्षेत्रीय दलों के आधार को अंदर से खोखला करती है।
सांगठनिक ढांचा : भाजपा ने चुनाव को एक इवेंट के बजाय एक 24x7 चलने वाली प्रक्रिया बना दिया है। बूथ स्तर पर 'पन्ना प्रमुखों' की नियुक्ति और कार्यकर्ताओं का विशाल नेटवर्क विपक्षी दलों के पास फिलहाल नहीं है।
राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का समावेश: पार्टी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास (Vikas) को एक साथ जोड़कर एक ऐसा 'वोट बैंक' तैयार किया है जो जातिगत सीमाओं से ऊपर उठकर मतदान करता है।
नेतृत्व का अभाव और अस्पष्टता: राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन (जैसे I.N.D.I.A.) अक्सर 'चेहरे' के सवाल पर उलझ जाता है। राहुल गांधी या क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच नेतृत्व की खींचतान जनता में अविश्वास पैदा करती है।
क्षेत्रीय दलों की सीमाएं: ममता बनर्जी (बंगाल), स्टालिन (तमिलनाडु) या पिनाराई विजयन (केरल) जैसे नेता अपने राज्यों में तो मजबूत हैं, लेकिन उनकी पहुंच राष्ट्रीय स्तर पर सीमित है।
Edited By: Naveen R Rangiyal