'दीदी' के कोर वोटबैंक में बीजेपी ने कैसे लगाई सेंध, क्या 3,000 रुपए के लिए पलट गईं महिला वोटर्स
ज़ाहिद अहमद May 06, 2026 06:12 AM

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति के एक सबसे मजबूत किले को ढहा दिया. ममता बनर्जी के लिए बंगाल की महिलाएं पिछले 15 साल से 'दीदी' का अभेद कवच थीं, उनके गढ़ में बीजेपी ने ऐतिहासिक सेंध लगा दी. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 53% महिलाओं ने TMC का साथ दिया था और पार्टी ने 42 में से 29 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया था. लेकिन इस बार उच्च महिला मतदान के बावजूद TMC महिलाओं को अपने पक्ष में भुना पाने में नाकाम रही. लेकिन क्यों?

लक्ष्मीर भंडार बनाम 3000 का वादा: कैश की जंग ममता हार गईं

पिछले डेढ़ दशक में ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी कल्याणकारी योजनाएं रही थीं, जिसमें 'कन्याश्री' और 'लक्ष्मीर भंडार' ने महिलाओं को आर्थिक सहारा दिया. 2.4 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में हर महीने सीधे पैसे पहुंचाने का यह मॉडल एक जादुई चुनावी ढाल माना जाता था, जिसमें  लेकिन 2026 में यह ढाल भेद दी गई. हालांकि, ममता ने चुनाव से पहले सामान्य वर्ग के लिए पैसे बढ़ाकर 1,500 और SC/ST के लिए 1,700 रुपए प्रतिमाह कर दी थी.

बीजेपी ने ममता की इसी रणनीति पर बड़ा दांव खेलते हुए हर महिला को 3,000 रुपए प्रति माह देने का वादा किया. 33% सरकारी नौकरियों में आरक्षण और मुफ्त बस सेवा जैसे 15 अलग-अलग वादे किए. 'दीदी' की ओर से मिल रहे 1,500 रुपए के मुकाबले बीजेपी का 3,000 रुपए का वादा दोगुना था.

दरअसल, नवंबर 2023 से देश के 11 राज्यों में महिलाओं को कैश देने की योजनाएं या तो शुरू की गई या उनका चुनावी ऐलान हुआ, जिनमें से कर्नाटक की 'गृह लक्ष्मी', मध्य प्रदेश की 'लाड़ली बहना' और महाराष्ट्र की 'लाड़की बहिन' योजना शामिल हैं. 2022-23 में सिर्फ 2 राज्यों में ऐसी स्कीम थीं, लेकिन 2026 तक यह आंकड़ा 12 राज्यों तक पहुंच गया, जिन पर कुल खर्च 1.68 लाख करोड़ रुपए तक जा पहुंचा. इन 11 में से 10 राज्यों में ये कैश स्कीमें सत्ता दिलाने में कामयाब रहीं. बंगाल की महिलाओं के लिए यह संदेश साफ था, उन्हें भी बाकी राज्यों की तरह और अधिक आर्थिक सहायता का अधिकार है.

महिला आरक्षण बिल: TMC को 'महिला-विरोधी' साबित करने का मास्टरस्ट्रोक  

चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने चुनाव प्रचार के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाकर लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने की कोशिश की. साथ ही 33% महिला आरक्षण देने वाला संविधान संशोधन विधेयक लाने का प्रयास किया. इस विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, लेकिन इसे दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी 352 वोट नहीं मिल पाए और विधेयक गिर गया.

इसके बाद बीजेपी ने पूरे बंगाल में जोर-शोर से यह नैरेटिव सेट कर दिया कि TMC और कांग्रेस ने मिलकर महिलाओं के आरक्षण के अधिकार को छीन लिया. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार चुनावी रैलियों में कहा कि 'TMC महिला सशक्तिकरण और आरक्षण नहीं चाहती.'

पीड़ित चेहरे और सुरक्षा का सवाल: संदेशखाली और आरजी कर का बदला

बीजेपी ने तीसरा और सबसे संवेदनशील दांव महिला सुरक्षा के मुद्दे पर खेला. जिस राज्य में 'दीदी' खुद को महिलाओं की संरक्षक बताती थीं, वहां संदेशखाली कांड और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की दुष्कर्म-हत्या की घटना ने TMC सरकार की छवि को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया था. बीजेपी ने इस गुस्से को सीधे चुनावी समर में उतारने का फैसला किया.

संदेशखाली आंदोलन का चेहरा बनीं रेखा पात्रा को हिंगलगंज सीट से और आरजी कर पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को पनिहाटी सीट से बीजेपी ने उम्मीदवार बना दिया. चुनाव नतीजों में रेखा पात्रा ने 5,421 वोटों से अपनी सीट जीती, जबकि रत्ना देबनाथ ने 28,836 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.

PM मोदी ने 14 अप्रैल 2026 को पनिहाटी की रैली में सीधा ऐलान किया कि बीजेपी सरकार आने पर 'बंगाल की माताओं-बहनों को रात 2 बजे भी घर से निकलने में डर नहीं लगेगा'. उन्होंने ममता बनर्जी के 12 अक्टूबर 2025 के उस बयान पर सीधा निशाना साधा, जिसमें ममता ने महिलाओं को रात में बाहर न निकलने की सलाह दी थी.

तीनों मोर्चों पर घिर गईं ममता बनर्जी

बीजेपी की इस जीत की गहराई में जाएं तो साफ नजर आता है कि ममता बनर्जी अपनी ही बनाई पिच पर तीन मोर्चों से घिर गईं. कैश की लड़ाई में बीजेपी का 3,000 रुपए का वादा उनके 1,500 रुपए पर भारी पड़ा, संसद में महिला आरक्षण बिल गिरने के बाद TMC 'महिला-विरोधी' की कठघरे में खड़ी नजर आई और सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी के शासन में पीड़ित हुई रेखा पात्रा और रत्ना देबनाथ जैसी महिलाओं की भारी जीत ने राज्य की आधी आबादी के मन में 'दीदी' के प्रति विश्वास की नींव को हिला दिया.

© Copyright @2026 LIDEA. All Rights Reserved.