होर्मुज से कितना कमाता था ईरान, अगर खुल गया रास्ता तो अब कैसे वसूलेगा टोल
TV9 Bharatvarsh June 12, 2026 09:43 PM

100 दिनों से भी ज्यादा समय से चला आ रहा ईरान-अमेरिका युद्ध अब शांति की ओर अग्रसर होता हुआ दिखाई दे रहा है. दरअसल ईरान की अर्ध-सरकारी मेहर न्यूज एजेंसी के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध वीराम को लेकर लगभग बात बन गई हैं और दोनों देशों ने युद्ध को तुरंत और स्थायी रूप से खत्म करने पर सहमति बनाई है. इस सबके बीच एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) चर्चा के केंद्र में है. फारस की खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ माना जाता है.

वैश्विक स्तर पर समुद्र के जरिए होने वाले तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है. इसके अलावा बड़ी मात्रा में LNG भी इसी रास्ते से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचती है. हाल के घटनाक्रमों के बीच खबरें सामने आई हैं कि ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ट्रांजिट शुल्क लगाने की संभावना पर विचार कर रहा है. अगर ऐसा होता है तो यह ईरान के लिए तेल निर्यात से भी बड़ा आय स्रोत बन सकता है.

प्रति बैरल 1 डॉलर शुल्क लगाने की चर्चा

रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर प्रति बैरल 1 डॉलर का शुल्क लगाने की योजना पर विचार कर रहा है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यह व्यवस्था पूरी तरह लागू हो जाती है तो ईरान को हर साल 70 से 80 अरब डॉलर तक की आय हो सकती है.

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान की तेल निर्यात आय इससे काफी कम रही है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ईरान ने 2023 में तेल निर्यात से लगभग 41.1 अरब डॉलर और 2024 में 46.7 अरब डॉलर की कमाई की थी. ऐसे में ट्रांजिट शुल्क से होने वाली संभावित आय तेल निर्यात से होने वाली कमाई को भी पीछे छोड़ सकती है.

युद्ध के बावजूद बढ़ी ईरान की तेल आय

पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनावों के बावजूद ईरान ने अपने तेल निर्यात को बनाए रखा है. हालिया रिपोर्टों के अनुसार मार्च 2026 में ईरान की दैनिक तेल आय करीब 139 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई, जो फरवरी में 115 मिलियन डॉलर थी.

दिलचस्प बात यह है कि संघर्ष के बावजूद ईरान का कच्चे तेल का निर्यात लगभग 16 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर बना हुआ है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईरानी तेल पर मिलने वाली छूट भी कम हुई है, जिससे उसे बेहतर कीमत मिलने लगी है.

कैसे शुरू हुआ होर्मुज संकट?

तनाव तब बढ़ा जब फरवरी के अंत में अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए सैन्य हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही सीमित कर दी. यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ा झटका साबित हुआ क्योंकि दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल और LNG इसी मार्ग से होकर गुजरता है.

होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट आने के बाद तेल की कीमतों में तेजी देखी गई और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई. हजारों जहाज दोनों ओर फंस गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हुआ.

समुद्र में फंसे जहाजों पर बढ़ा आर्थिक दबाव

जहाजों की निगरानी करने वाली एजेंसियों के मुताबिक, संघर्ष के दौरान सैकड़ों तेल टैंकर और मालवाहक जहाज होर्मुज स्ट्रेट के आसपास फंस गए. इनमें करोड़ों बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद भरे हुए थे. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी जहाज का लंबे समय तक समुद्र में खड़ा रहना बेहद महंगा पड़ता है.

जहाज मालिकों को चालक दल का वेतन, बीमा प्रीमियम, बैंक ऋण की किस्तें, रखरखाव और सुरक्षा खर्च लगातार उठाने पड़ते हैं. युद्ध क्षेत्र में होने के कारण बीमा कंपनियां अतिरिक्त जोखिम शुल्क भी वसूलती हैं. इसी वजह से कई जहाज मालिकों के लिए शुल्क देकर आगे बढ़ना, लंबे समय तक समुद्र में फंसे रहने से सस्ता विकल्प माना जा रहा है.

क्या ईरान पहले से वसूली कर रहा है?

कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि संघर्ष शुरू होने के बाद ईरान ने कुछ जहाजों को गुजरने की अनुमति देने के बदले लाखों डॉलर तक शुल्क लिया है. बताया जा रहा है कि कुछ मामलों में यह राशि 20 लाख डॉलर प्रति जहाज तक पहुंची. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह संकेत जरूर मिलता है कि ईरान अपने भौगोलिक महत्व को आर्थिक अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है.

अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. क्या ईरान कानूनी रूप से होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगा सकता है? अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुसार होर्मुज एक प्राकृतिक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है. ऐसे जलमार्गों में सभी देशों के जहाजों को स्वतंत्र आवाजाही का अधिकार प्राप्त होता है. इसलिए किसी देश को केवल मार्ग से गुजरने के लिए टोल वसूलने का अधिकार नहीं है.

हालांकि सुरक्षा, नेविगेशन, ट्रैफिक प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, बचाव सेवाओं और निगरानी जैसी सुविधाओं के लिए शुल्क लिया जा सकता है. यही रास्ता ईरान के लिए कानूनी रूप से अधिक व्यावहारिक माना जा रहा है.

पनामा और स्वेज नहर से कैसे अलग है होर्मुज?

कई लोग होर्मुज की तुलना पनामा और स्वेज नहर से करते हैं, लेकिन दोनों में बड़ा अंतर है. पनामा नहर और स्वेज नहर मानव निर्मित जलमार्ग हैं. इनका निर्माण, रखरखाव और संचालन संबंधित देशों द्वारा किया जाता है, इसलिए वहां से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूला जाता है.

वहीं होर्मुज एक प्राकृतिक स्ट्रेट है. यह केवल ईरान के नियंत्रण में नहीं है बल्कि इसके कुछ हिस्से ओमान और आसपास के अन्य देशों की समुद्री सीमाओं से भी जुड़े हैं. इसलिए यहां एकतरफा टोल लागू करना आसान नहीं होगा.

क्या खाड़ी देशों के साथ समझौता संभव है?

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ईरान, ओमान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश मिलकर एक क्षेत्रीय समुद्री प्राधिकरण बना सकते हैं. यह संस्था जहाजों की सुरक्षा, निगरानी, आपातकालीन सहायता और पर्यावरण संरक्षण जैसी सेवाएं प्रदान कर सकती है.

ऐसी स्थिति में जहाजों से सेवा शुल्क वसूला जा सकता है, जिसे सभी संबंधित देशों के बीच साझा किया जाए. हालांकि इसके लिए अमेरिका, चीन और अन्य प्रमुख शक्तियों की सहमति भी जरूरी होगी.

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर

होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह का बदलाव केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा. भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की तेल आपूर्ति काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर है.

यदि यहां स्थायी शुल्क व्यवस्था लागू होती है तो तेल परिवहन की लागत बढ़ सकती है. इसका असर पेट्रोल, डीजल, गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है. वहीं अगर कोई समझौता बन जाता है और आवाजाही सुचारु रहती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिरता मिल सकती है.

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