राजस्थान के उदयपुर स्थित एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम झील इन दिनों संकट का सामना कर रही है. कभी प्रतिदिन 40 से 45 क्विंटल मछलियों के उत्पादन के लिए पहचान रखने वाली जयसमंद झील आज गंभीर संकट से जूझ रही है. एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम मीठे पानी की झील में मत्स्य उत्पादन घटकर महज 60 से 80 किलो प्रतिदिन रह गया है. इसका सीधा असर झील से जुड़े करीब 2500 मछुआरा परिवारों की आजीविका पर पड़ा है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई परिवारों को रोजगार की तलाश में दूसरे जलाशयों की ओर पलायन करना पड़ रहा है.
जयसमंद झील से जुड़ी 23 मत्स्य उत्पादक सहकारी समितियां लगातार उत्पादन में गिरावट को लेकर चिंतत हैं. मछुआरों और मत्स्य कारोबारियों का कहना है कि झील में पर्याप्त मात्रा में मत्स्य बीज नहीं छोड़े जाने, जलीय घास के अत्यधिक फैलाव और प्रबंधन की कमियों के कारण यह स्थिति पैदा हुई है.
अब नहीं मिलती बड़ी मछलियांइसके चलते कई स्थानीय प्रजाति की मछलियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं, जबकि कुछ विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं. वहीं मछुआरों का कहना है कि पहले 35 से 40 किलो वजन की बड़ी मछलियां आसानी से मिल जाती थीं. वहीं अब 7 से 8 किलो वजन की मछलियां भी मुश्किल से पकड़ में आती हैं.
हजारों परिवारों पर रोजी-रोटी का संकटमत्स्य उत्पादन में गिरावट का असर रोजगार पर भी साफ दिखाई दे रहा है, जहां पहले झील में 1200 से 1500 नावें नियमित रूप से मछली पकड़ने के लिए उतरती थीं, वहीं अब यह संख्या घटकर केवल 15 से 20 नावों तक सिमट गई है. इससे हजारों परिवारों की आमदनी प्रभावित हुई है और आर्थिक संकट गहराता जा रहा है. मछुआरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.
घट गया उत्पादनमत्स्य ठेकेदार सुखलाल के अनुसार कई प्रजातियां खत्म हो चुकी. पहले रोज 45-50 क्विंटल मछलियां तौल केंद्र पर आती थीं, जो अब घटकर 60-80 किलो ही पहुंच रही हैं. कई प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं और विक्रेता दूसरी जगहों की मछलियां जयसमंद की बताकर बेच रहे हैं. वहीं इस मामले को लेकर जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी का कहना है कि यदि ऐसा मामला है तो इसकी जानकारी लेकर आवश्यक कार्रवाई कराई जाएगी.
किसने बनवाई थी झील?महाराणा जयसिंह द्वारा गोमती नदी पर निर्मित जयसमंद झील राजस्थान की महत्वपूर्ण मत्स्य संपदा मानी जाती है. झील में नौ नदियों और 99 नालों का पानी आता है और इसकी जल भंडारण क्षमता करीब 14,550 एमसीएफटी है. झील की गहराई 200 फीट से अधिक बताई जाती है. इसके बावजूद उत्पादन में आई भारी गिरावट कई सवाल खड़े कर रही है.
मछुआरा समितियों ने लगाए ये आरोपमछुआरा समितियों का आरोप है कि साल 1977 से 2005 तक जनजाति क्षेत्र विकास सहकारी संघ (राजसंघ) के माध्यम से बेहतर प्रबंधन होता था. वर्ष 2006 में संचालन मत्स्य विभाग के अधीन आने के बाद स्थिति बिगड़ने लगी. इसलिए समितियां फिर से राजसंघ मॉडल लागू करने की मांग कर रही हैं.
गायब हो गईं ये प्रजातियांझील में कभी 42 प्रजातियों की मछलियां पाई जाती थीं, लेकिन अब महाशीर, कालबोस, ममोला और पीटार जैसी कई प्रजातियां लगभग गायब हो चुकी हैं. मछुआरों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो जयसमंद की समृद्ध मत्स्य संपदा और उससे जुड़े हजारों परिवारों का भविष्य गंभीर संकट में पड़ सकता है.
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