अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने अमेरिका-चीन केंद्रित 'G2' व्यवस्था के विचार पर कड़ी आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि अगर वैश्विक व्यवस्था सिर्फ अमेरिका और चीन के इर्द-गिर्द बनाई जाती है, तो इससे भारत को नजरअंदाज करने का खतरा पैदा होगा. बोल्टन ने कहा कि मौजूदा दौर में चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक सहयोग पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है.
'G2' मॉडल पर उठाए सवाल
समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में बोल्टन ने कहा कि दुनिया अमेरिका और चीन के नेतृत्व वाले ढांचे की ओर नहीं बढ़नी चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत को इस रणनीति से बाहर रखना एक "खतरनाक भूल" होगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम है.
चीन की बढ़ती चुनौती का किया जिक्र
बोल्टन ने कहा कि ताइवान स्ट्रेट, दक्षिण चीन सागर और भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर बढ़ते तनाव यह दिखाते हैं कि बीजिंग की महत्वाकांक्षाएं 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं. ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच मजबूत साझेदारी समय की जरूरत है.
मोदी-ट्रंप के बीच रणनीतिक चर्चा की वकालत
बोल्टन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच चीन से जुड़े रणनीतिक मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए. उनके मुताबिक अब तक दोनों नेताओं की बातचीत अक्सर व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दों तक सीमित रह जाती है, जबकि सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.
G7 बैठक को बताया अहम मौका
बोल्टन ने कहा कि G7 शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी और ट्रंप की मुलाकात दोनों नेताओं के रिश्तों को मजबूत करने का अच्छा अवसर थी. हालांकि, उन्होंने माना कि इस बैठक से कोई बड़ा ठोस परिणाम सामने नहीं आया, लेकिन दोनों नेताओं का संवाद जारी रहना महत्वपूर्ण है.
टैरिफ नीति पर भी साधा निशाना
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने ट्रंप की टैरिफ नीति की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि यह नीति भारत के साथ अनुचित तरीके से लागू की गई है और इससे दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक हित प्रभावित हो सकते हैं. उनका मानना है कि व्यापारिक विवादों को पीछे छोड़कर सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए.
क्वाड को और मजबूत बनाने की सलाह
बोल्टन ने भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के समूह 'क्वाड' को और अधिक प्रभावी बनाने की वकालत की. उन्होंने कहा कि सहयोग केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें खुफिया जानकारी साझा करना, सैन्य समन्वय और व्यापक सुरक्षा सहयोग भी शामिल होना चाहिए. उनका कहना था कि चीन की चुनौती का सामना सभी साझेदार देशों को मिलकर करना होगा.