मध्य प्रदेश के मांडू की खुरासानी इमली को GI टैग मिल गया है. यह टैग मिलने के बाद किसी भी चीज की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बढ़ती है और भरोसा भी. वहां के स्थानीय लोगों को इसका फायदा मिलता है और उसे विरासत के तौर पर सुरक्षित रखा जाता है. खुरासानी इमली को सुरक्षित रखने का काम यहां के आदिवासियों ने किया है. अब खुरासानी इमली की पाॅपुलैरिटी में बढ़ोतरी होगी. इसकी पहचान बढ़ेगी. इसकी खूबियां और उत्पत्ति के बारे में दुनिया को पता चलेगा. मार्केटिंग और ब्रांडिंग आसान हो सकेगी.
मांडू में इसे बाओबाब वृक्ष के नाम से जाना जाता है. अब तक यहां के आदिवासी बाओबाब वृक्ष से निकलने वाली इमली से बने उत्पादों को स्थानीय स्तर पर बेचते थे, लेकिन अब इन्हें आधिकारिक मुहर के साथ बेचा जाएगा और विश्वसनीयता बढ़ेगी. इस फल का गूदा इमली की तरह खट्टा होता है, इसलिए इसे खुरासानी इमली कहा गया.
कहां से भारत आई खुरासानी इमली?भारत में खुरासानी इमली का इतिहास बहुत पुराना है. यह करीब 600 साल पहले मध्य प्रदेश के मांडू पहुंची थी. दावा किया जाता है कि यह इमली अरब और अफगानी व्यापारियों के जरिए यहां पहुंची. दावा यह भी किया जाता है कि मालवा सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को अफगानिस्तान के खुरासान के सुल्तान ने उपहार के तौर पर दी थी. उन्हें बोलने वाले तोते और बाओबाब के पौधे भेंट किए थे. पौधे खुरासान से लाए गए थे इसलिए इसे खुरासान इमली नाम दिया गया.
खुरासानी इमली.
अलाउद्दीन खिलजी ने पूरे साम्राज्य में खुरासानी इमली के पौधे लगाए थे, लेकिन सिर्फ मांडू और आसपास के क्षेत्रों में ही अनुकूल जलवायु मिलने से यह पनप सके. यही कारण है कि आज यह पेड़ पूरे भारत में सिर्फ मांडू में मिलता है.समय के साथ इसकी प्रजाति भारत में विकसित हो गई और इसका दायरा बढ़ता गया. यहां की जलवायु और मिट्टी में इसके पेड़ बढ़ते गए और मांडू खुरासानी इमली का गढ़ बन गया.

धार की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, मांडू मध्य प्रदेश के धार जिले में आता है. यह शहर से 35 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां की इमली का स्वाद खट्टा मीठा है. फ्रांसीसी वानस्पति शास्त्री मिशेल एडनसन के मुताबिक, इसके पेड़ के तने का व्यास करीब 30 मीटर तक हो सकता है. यह इमली विटामिन-सी का अच्छा सोर्स होती है और इसमें एंटीऑक्सीडेंट् होते हैं. इसका इस्तेमाल पेट से जुड़ी दिक्कतों में किया जाता है. इसे खाने के बाद 4 घंटे तक प्यास नहीं लगती. भीषण गर्मी में डिहाइड्रेशन से बचाती है.
खुरासानी इमली का पेड़ देखने में उल्टा लगता है.
इसके पेड़ को देखकर ऐसा लगता है कि इसे उल्टा लटकाया गया हो. यानी जड़ें ऊपर और तना नीचे. बारिश के मौसम को छोड़ दें तो इसमें पत्तियां नहीं होतीं. शाखाओं में बड़े-बड़े लॉकेट के रूप में इसके फल होते हैं. आदिवासी विदेशियों को यह फल 150 से 200 रुपये प्रति फल और भारतीय पर्यटकों को 50 से 100 रुपये प्रति फल बेचते हैं. यही उनकी रोजी-रोटी का जरिया है.
बाओबाब पेड़ अपने विशाल, पानी जमा करने वाले तनों और उल्टे पेड़ जैसी अनोखी शाखाओं के लिए जाने जाते हैं. ये मांडू की खास पहचान बन गए हैं और ये पेड़ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हैं. स्थानीय गाइड कहते हैं, खुरासानी इमली के पेड़ यहां के पर्यटकों के टूर का हिस्सा बनते हैं. देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को इसकी खूबियों और महत्व के बारे में बताया जाता है.
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