इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV) से लेकर आपके स्मार्टफोन, विंड टर्बाइन और सेना की मिसाइलों तक, आज हर आधुनिक तकनीक ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ (दुर्लभ खनिजों) पर टिकी है. इस अहम बाजार पर अब तक चीन का एकछत्र राज रहा है. लेकिन अब भारत ने इस निर्भरता को हमेशा के लिए खत्म करने की बड़ी तैयारी कर ली है. हाल ही में नई दिल्ली में क्वाड देशों (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान) ने 20 अरब डॉलर के ‘क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क’ पर मुहर लगाई है. इस भारी-भरकम निवेश का सीधा मकसद खनन, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग का ऐसा मजबूत ढांचा तैयार करना है, जिससे दुनिया भर की सप्लाई चेन को सुरक्षित किया जा सके और भारत को एक नए ग्लोबल हब के रूप में खड़ा किया जा सके.
चीन के ‘कब्जे’ को तोड़ने का फुलप्रूफ प्लानदुनिया भर में जो भी दुर्लभ खनिज निकाले जाते हैं, उसकी रिफाइनिंग क्षमता का 80 फीसदी हिस्सा अकेले चीन कंट्रोल करता है. इलेक्ट्रिक व्हीकल और डिफेंस में काम आने वाले ‘परमानेंट मैग्नेट’ के उत्पादन में तो चीन की हिस्सेदारी 94 फीसदी है. साल 2023 में चीन ने इसी एकाधिकार का फायदा उठाते हुए इन खनिजों के निर्यात पर पाबंदियां लगा दी थीं. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ किया है कि इस अहम तकनीक को किसी एक देश की दादागिरी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसी खतरे को भांपते हुए भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी खनन से लेकर प्रोसेसिंग तक पूरी सप्लाई चेन में आपसी सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया है.
भारत ने बिछाई दुनिया भर में बिसातचीन को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए नई दिल्ली ने देश के साथ-साथ विदेशों में भी खदानों की तलाश तेज कर दी है. कच्चे माल की सुरक्षित सप्लाई के लिए जनवरी 2024 में सरकारी कंपनी ‘काबिल’ (KABIL) ने अर्जेंटीना में लिथियम ब्लॉक के लिए अपना पहला विदेशी करार किया. इसके अलावा अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री के जापान दौरे पर क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर अहम एमओयू साइन हुआ और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी लिथियम और कोबाल्ट प्रोजेक्ट्स पर बात आगे बढ़ी है. हाल ही में 1 जून को म्यांमार के साथ भी दुर्लभ खनिजों को लेकर भारत की अहम बातचीत पक्की हुई है.
प्रोसेसिंग की वह चुनौती जिसे पार करना है जरूरीकच्चा माल खोजना आधी लड़ाई जीतने जैसा है, असली चुनौती उसकी प्रोसेसिंग है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का 80 से 90 फीसदी परमानेंट मैग्नेट आज भी चीन से ही आयात करता है. देश की रिफाइनिंग क्षमता फिलहाल घरेलू मांग का 25 फीसदी भी नहीं है. भारत के समुद्री तटों (केरल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु) पर मिलने वाले ‘मोनाज़ाइट सैंड्स’ में ये दुर्लभ खनिज भरपूर मात्रा में हैं. लेकिन इनमें थोरियम और यूरेनियम होने के कारण इसे परमाणु ऊर्जा कानून के तहत रखा गया है. इसका मतलब है कि निजी कंपनियां इसकी प्रोसेसिंग नहीं कर सकतीं, यह काम केवल सरकारी कंपनियों के पास है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को खदान खोलने के साथ-साथ तुरंत अपनी मेटल-टू-अलॉय कनवर्जन (धातु बनाने की) क्षमता बढ़ानी होगी.
मिशन 34 हजार करोड़ से बदलेगी तस्वीरइन घरेलू चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने जनवरी 2025 में 34,300 करोड़ रुपये के भारी भरकम ‘नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ को मंजूरी दी है. इसके अलावा वित्त वर्ष 2027 के बजट में चार राज्यों में ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर’ बनाने का भी ऐलान हुआ है. जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) अब पारंपरिक खदानों से आगे बढ़कर राजस्थान, गुजरात और असम के नए इलाकों में आधुनिक तकनीक से इन खनिजों की खोज कर रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी देश क्रिटिकल मिनरल्स के मामले में 100 फीसदी आत्मनिर्भर नहीं हो सकता. लेकिन भारत अगर क्वाड देशों के तकनीकी सहयोग के साथ अगले दस साल तक लगातार सही दिशा में निवेश करे, तो वह चीन का एक बड़ा विकल्प जरूर बन सकता है. ऐसा होने पर न सिर्फ भारत की रणनीतिक सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियां और इलेक्ट्रॉनिक्स का सामान भी सस्ता हो सकेगा.