Kamakhya Mandir Ambubachi Mela 2026: कामाख्या में अंबुबाची मेला आज से शुरू, जानिए यहां क्यों जुटते हैं दुनिया भर के अघोरी और तांत्रिक
TV9 Bharatvarsh June 23, 2026 03:43 PM

Ambubachi Mela 2026: असम की नीलांचल पहाड़ियों पर स्थित प्रसिद्ध कामाख्या देवी मंदिर में आज यानी 22 जून से विश्व प्रसिद्ध अंबुबाची मेले की शुरुआत हो गई है. देश के 51 शक्तिपीठों में कामाख्या मंदिर का स्थान सबसे सर्वोच्च और रहस्यमयी माना जाता है. यह भारत का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां मां दुर्गा की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि यहां देवी के महामुद्रा की पूजा होती है. अंबुबाची मेले के दौरान मां कामाख्या के इस पावन धाम में एक बेहद अनोखी और प्राकृतिक घटना होती है, जिसे देखने और महसूस करने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु, अघोरी और सिद्ध तांत्रिक यहां पहुंचते हैं.

क्यों खास है कामाख्या मंदिर?

कामाख्या मंदिर नीलांचल पर्वत पर स्थित है और इसे शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है. यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिला की पूजा की जाती है. मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती का योनि भाग गिरा था, जिसके कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ. मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि हर साल अंबुबाची के दौरान देवी के रजस्वला होने की मान्यता मानी जाती है. इसी वजह से मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं और इस दौरान नियमित पूजा भी रोक दी जाती है. कामाख्या मंदिर के गर्भगृह में माता की कोई मानव रूपी मूर्ति नहीं है. वहां एक प्राकृतिक शिला है जिसके बीच में एक प्राकृतिक दरार है. इस दरार को ही देवी की महामुद्रा या योनि मुद्रा कहा जाता है.

अंबुबाची मेले के दौरान क्यों बंद होते हैं मंदिर के कपाट?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अंबुबाची के समय देवी मां मासिक धर्म की अवस्था में होती हैं. इसे देवी के विश्राम का समय माना जाता है. इसलिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और किसी भी श्रद्धालु को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती. मान्यता है कि इस अवधि में धरती माता भी उर्वरता और सृजन शक्ति से जुड़ी विशेष ऊर्जा प्राप्त करती हैं. यही कारण है कि इस पर्व को प्रकृति और स्त्री शक्ति के सम्मान का प्रतीक भी माना जाता है.

क्यों जुटते हैं अघोरी और तांत्रिक?

अंबुबाची मेला तंत्र साधना के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवसरों में से एक माना जाता है. मान्यता है कि इस दौरान साधना और मंत्र सिद्धि का विशेष महत्व होता है. यही वजह है कि देश-विदेश से तांत्रिक, अघोरी, नागा साधु और विभिन्न संप्रदायों के साधक कामाख्या पहुंचते हैं. कई साधक इस दौरान विशेष अनुष्ठान, ध्यान और साधना करते हैं. माना जाता है कि अंबुबाची के दिनों में आध्यात्मिक ऊर्जा अपने चरम पर होती है, जिससे साधना का प्रभाव अधिक बढ़ जाता है. यही कारण है कि यह मेला रहस्य, आस्था और तंत्र साधना का अनोखा संगम माना जाता है.

लाल वस्त्र और लाल जल की मान्यता

अंबुबाची मेला शुरू होने से पहले पुजारी गर्भगृह में स्थित पवित्र शिला के पास सफेद अंगवस्त्र रखते हैं. तीन दिनों बाद जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तो श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में लाल रंग का वस्त्र दिया जाता है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है. इसके साथ ही एक मान्यता यह भी है कि इस दौरान ब्रह्मपुत्र नदी का जल लाल रंग का दिखाई देता है. हालांकि इसके पीछे अलग-अलग धार्मिक और प्राकृतिक मान्यताएं प्रचलित हैं, लेकिन श्रद्धालु इसे देवी की दिव्य शक्ति का प्रतीक मानते हैं.

कब खुलेंगे मंदिर के कपाट?

अंबुबाची मेला शुरू होने के बाद मंदिर के कपाट तीन दिनों तक बंद रहेंगे. इसके बाद 26 जून की सुबह विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी. पूजा के बाद मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए फिर से खोल दिए जाएंगे और भक्त देवी मां के दर्शन कर सकेंगे.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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