Muharram 2026: सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की विश्व प्रसिद्ध दरगाह में मुहर्रम की मुकद्दस रस्मों का सिलसिला पूरे श्रद्धा और सम्मान के साथ जारी है. मुहर्रम की 8वीं तारीख को दरगाह शरीफ में इमाम हुसैन की याद में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान ‘नक्शे मुबारक’ की भव्य सवारी निकाली गई, जिसमें देश-विदेश से आए हजारों जायरीन और अकीदतमंद शामिल हुए. दरगाह परिसर आध्यात्मिक माहौल, मातमी रस्मों और अकीदत के रंग में सराबोर नजर आया.
‘नक्शे मुबारक’ की सवारी में दिखी गहरी आस्था
मुहर्रम के अवसर पर दरगाह शरीफ के मुख्य द्वार से इमाम आली मकाम के रोजे (मजार) के ‘नक्शे मुबारक’ की सवारी निकाली गई. यह सवारी पूरे अदब और एहतराम के साथ दरगाह परिसर से होकर छतरी गेट तक पहुंची. रास्ते भर श्रद्धालु इमाम हुसैन की याद में सलाम और नजराने पेश करते रहे.
दरगाह के खादिम सैयद जहूर बाबा चिश्ती के अनुसार, छतरी गेट पर पहुंचने के बाद अकीदतमंदों ने मर्सिया ख्वानी कर कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की. इस दौरान वातावरण भावुक और आध्यात्मिक भावनाओं से भर गया. बड़ी संख्या में मौजूद जायरीनों ने इमाम आली मकाम की बारगाह में अपनी अकीदत का नजराना पेश किया.
नजरानों से महक उठता है दरगाह का माहौल:
मुहर्रम के दौरान दरगाह में मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार फल, सूखे मेवे, फूलों और आकर्षक सेहरों की पेशकश करते हैं. इमाम हुसैन की याद में किए गए नेक काम और दुआएं इंसान को आध्यात्मिक सुकून प्रदान करती हैं. यही कारण है कि हर साल मुहर्रम के दिनों में अजमेर शरीफ में देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से भी जायरीन पहुंचते हैं.
आखिर क्यों बच्चों को ‘गिरवी’ रखते हैं अकीदतमंद?
दरगाह शरीफ में निभाई जाने वाली एक अनोखी और सदियों पुरानी रिवायत लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित करती है. सैयद जहूर बाबा चिश्ती ने बताया कि कई परिवार अपनी बड़ी मुरादें पूरी होने की उम्मीद में अपने बच्चों, भाइयों या बहनों को इमाम की जमानत में सांकेतिक रूप से ‘गिरवी’ रख देते हैं.
यह परंपरा पूरी तरह धार्मिक आस्था और प्रतीकात्मक विश्वास पर आधारित होती है. जब मन्नत पूरी हो जाती है, तब अगले साल मुहर्रम के अवसर पर परिवार दरगाह पहुंचकर निर्धारित नजराना और हिलाल पेश करता है. इसके बाद धार्मिक रस्मों के साथ उस व्यक्ति को मन्नत से ‘छुड़ाया’ जाता है. यह रिवायत सालों से दरगाह शरीफ की आध्यात्मिक परंपराओं का हिस्सा बनी हुई है.
दरगाह में जारी हैं नियाज और तौल की परंपराएं:
मुहर्रम के अवसर पर दरगाह परिसर में बच्चों को तौलने और नियाज वितरण की रस्में भी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही हैं. अकीदतमंद अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार नियाज का इंतजाम करते हैं, जिसे बड़ी संख्या में लोगों के बीच वितरित किया जाता है. इन रस्मों का उद्देश्य समाज में प्रेम, भाईचारा और सेवा की भावना को बढ़ावा देना माना जाता है.
कर्बला का संदेश आज भी देता है प्रेरणा
कर्बला की घटना को याद करते हुए सैयद जहूर बाबा चिश्ती ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन ने हर परिस्थिति में सच्चाई और इंसाफ का साथ दिया. उन्होंने बताया कि कर्बला केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए सब्र, त्याग और सत्य पर अडिग रहने का संदेश है.
उनके अनुसार, कर्बला हमें सिखाती है कि जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, इंसान को हक और इंसाफ के रास्ते से पीछे नहीं हटना चाहिए. यही संदेश आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है और मुहर्रम की रस्मों को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों की याद दिलाने वाला अवसर बनाता है.
मुहर्रम की 9वीं तारीख को ‘नक्शे मुबारक’ की यह पवित्र सवारी छतरी गेट से आगे इमामबाड़े के लिए रवाना होगी, जहां अगली धार्मिक रस्में अदा की जाएंगी.
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