Muharram 2026 Ashura: इन दिनों इस्लाम धर्म में मुहर्रम का पाक महीना चल रहा है. आज मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख है और आज आशूरा मानाया जा रहा है. मुहर्रम के पहले 10 दिन गम और मातम के होते हैं. मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा के दिन ताजिये निकाले जाते हैं. ताजिया इमाम हुसैन के मकबरे का वो प्रतीकात्मक मॉडल माना जाता है, जो कर्बला में स्थित है. माना जाता है कि मुहर्रम की 10वीं तारीख को ही पैगंबर मोहम्मद के नवासे यानी नाती इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ शहीद हुए थे. आइए कर्बला के शहीदों के दर्द की कहानी जानते हैं.
इराक के कर्बला में हई जंग की कहानी आज 1346 साल बाद भी सभी की आंखों में पानी ला देती है. ये जंग सत्ता के मद के सामने अपने सिद्धांतों की रक्षा के लड़ी गई थी. 10 मुहर्रम यानी आशूरा इतिहास का वो पन्ना माना जाता है, जब भूख और प्यास के बावजूद हक की आवाज खामोश नहीं हुई, बल्कि सदा के लिए अमर हो गई. दरअसल, इस्लाम के शुरुआती दौर में नेता यानी खलीफा का चुनाव आपसी सहमति से कर लिया जाता था, लेकिन मुआविया नाम के शासक ने इस नियम को बदल दिया.
इमाम हुसैन ने यजीद की सत्ता को नहीं मानामुआविया और हसन इब्न अली का जो शांति समझौता हुआ था, उसने उसको तोड़ दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि मुआविया अपने बाद किसी को उत्तराधिकार नहीं सौंपेंगे, लेकिन इसके बाद भी मुआविया ने अपने बेटे यजीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया. यजीद ने पैगंबर मोहम्मद साहब की दी हुई शिक्षाओं के विपरीत भ्रष्टाचार और दमनकारी नीतियां अपनानी शुरू कर दीं. इमाम हुसैन एक बेहद नेक और सम्मानित इंसान थे. उन्होंने यजीद की सत्ता को नहीं माना.
उन्होंने साफ कहा कि वो उस इंंसान की हुकूमत को नहीं मान सकते, जो इस्लाम के बुनियादी उसूलों को ही बदल रहा है. फिर इराक के कूफा शहर के लोगों ने इमाम हुसैन को उनका नेतृत्व करने के लिए बुलाया. इमाम अपने परिवार के 72 साथियों के साथ वहां के लिए निकल पड़े, लेकिन यजीद द्वारा पहले ही एक क्रूर अफसर, उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद को वहां भेजा गया और लोगों को डराया गया.
अपने 72 साथियों के साथ कुर्बानी का रास्ता चुनाइसका असर ये हुआ कि इमाम को बुलाने वाले लोग ही उनके खिलाफ हो गए. इमाम हुसैन के कर्बला के तपते मैदान में पहुंचते ही उनको यजीद की फौज ने घेर लिया. उसकी फौज द्वारा इमाम के परिवार और मासूम बच्चों के लिए फरात नदी का पानी तक बंद कर कर दिया गया. इसके बाद मुहरर्म की 10वीं तारीख आशूरा को इमाम और उनके 72 साथियों ने कुर्बानी का रास्ता चुना. इस जंग में इमाम के जवान बेटे, उनके भाई और यहां तक कि उनके छह महीने के मासूम बच्चे की भी शहादत हो गई. अंत में इमाम हुसैन की भी शहादत हो गई.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी इस्लामिक मान्यताओं पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.