शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले लोग अक्सर एक बड़ी व्यावहारिक गलती कर बैठते हैं. जब उन्हें किसी वित्तीय वर्ष के दौरान निवेश में मुनाफे के बजाय भारी नुकसान उठाना पड़ता है, तो वे मान लेते हैं कि अब इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की कोई आवश्यकता नहीं है. खासकर वे निवेशक ऐसा ज्यादा सोचते हैं जिनकी कोई अन्य टैक्स योग्य आय नहीं होती है. टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, घाटे वाले साल में आईटीआर फाइल न करना लंबे समय में आपकी जेब पर बहुत भारी पड़ सकता है. अगर आप तय समय सीमा के भीतर अपना रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं, तो आप अपने इस कैपिटल लॉस (पूंजीगत नुकसान) को अगले सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड करने यानी आगे ले जाने का कानूनी अधिकार खो देते हैं. इसका असर यह होगा कि भविष्य में जब आपको निवेश से मुनाफा होगा, तब आप इस पुराने घाटे को उस मुनाफे के साथ एडजस्ट नहीं कर पाएंगे और आपको सरकार को ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ेगा.
भविष्य के मुनाफे पर टैक्स बचाने का नियमटैक्स विशेषज्ञों के अनुसार, नुकसान होने के बावजूद समय पर आईटीआर भरने से आपको अपने घाटे को भविष्य की कमाई से एडजस्ट करने की कानूनी अनुमति मिलती है. टैक्स कंसल्टेंसी फर्म एनए शाह एसोसिएट्स के टैक्स पार्टनर गोपाल बोहरा इस पर महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं. उनका कहना है कि भले ही किसी टैक्सपेयर की उस साल कोई टैक्स देनदारी न बन रही हो और सिर्फ इक्विटी या म्यूचुअल फंड से कैपिटल लॉस हुआ हो, तब भी तय तारीख पर या उससे पहले आईटीआर दाखिल करना बेहद फायदेमंद सौदा है. समय पर रिटर्न भरने से आप इस नुकसान को अगले 8 सालों तक आगे ले जा सकते हैं. भविष्य के वर्षों में जब भी आपको शेयरों या म्यूचुअल फंड से मुनाफा होगा, तो आप इस पुराने घाटे को उस मुनाफे से घटाकर अपनी टैक्स देनदारी को काफी कम या पूरी तरह शून्य कर सकते हैं.
सभी तरह के निवेश पर लागू होता है ये रूलकई निवेशकों के मन में यह भ्रम रहता है कि नुकसान को आगे ले जाने का यह नियम सिर्फ शेयरों की खरीद-बिक्री पर लागू होता है. टैक्स एक्सपर्ट्स ने साफ किया है कि निवेश का माध्यम चाहे कोई भी हो, टैक्स के नियम सभी के लिए बिल्कुल एक समान हैं. आपका नुकसान चाहे इक्विटी शेयर्स से हुआ हो, इक्विटी म्यूचुअल फंड से हो, डेट म्यूचुअल फंड से हो या फिर गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) से, अगर आप इस अन-एडजस्टेड लॉस को भविष्य में इस्तेमाल करने के लिए आगे ले जाना चाहते हैं, तो आपको नियत तारीख के भीतर ही आईटीआर भरना होगा. निर्धारित समय सीमा चूकने के बाद विभाग घाटे को आगे ले जाने की अनुमति नहीं देता है.
शॉर्ट टर्म घाटे को कम करने की व्यवस्थानियमों के दायरे में रहकर आप इक्विटी के घाटे को दूसरे कैपिटल एसेट्स से हुए मुनाफे के खिलाफ आसानी से एडजस्ट कर सकते हैं. इसके लिए दो अलग-अलग श्रेणियां तय की गई हैं. पहला है शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस (STCL). अगर आपको शेयरों से कम अवधि में नुकसान हुआ है, तो इसे आप शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म दोनों तरह के कैपिटल गेन्स से एडजस्ट कर सकते हैं. फिर चाहे वह मुनाफा शेयरों से हो, प्रॉपर्टी बेचने से हो, गोल्ड से हो या डेट म्यूचुअल फंड से. इसके विपरीत, लॉन्ग-टर्म कैपिटल लॉस (LTCL) यानी लंबी अवधि के घाटे के नियम काफी कड़े हैं. इसे केवल और केवल लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) के खिलाफ ही एडजस्ट किया जा सकता है.
अपनी प्रोफाइल के अनुसार चुने फॉर्मसही आईटीआर फॉर्म का चुनाव पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके वित्तीय लेनदेन का स्वरूप क्या है. जो निवेशक शेयरों, म्यूचुअल फंड या अन्य कैपिटल एसेट्स से होने वाले केवल कैपिटल गेन्स या कैपिटल लॉस को रिपोर्ट कर रहे हैं, उन्हें आमतौर पर ITR-2 फॉर्म भरना होता है. दूसरी ओर, अगर आप शेयरों में इंट्राडे ट्रेडिंग करते हैं या फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) में ट्रेड करते हैं, तो इसे टैक्स की भाषा में बिजनेस इनकम माना जाता है. ऐसी स्थिति में आपको ITR-3 फॉर्म चुनना चाहिए. आईटीआर दाखिल करने से पहले निवेशकों को अपने एआईएस (AIS) और टीआईएस (TIS) में दर्ज ट्रांजैक्शन का मिलान अपने ब्रोकर की रिपोर्ट से जरूर कर लेना चाहिए ताकि भविष्य में टैक्स छूट का लाभ लेने में कोई रुकावट न आए.
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