दिल्ली मेट्रो भारत की पहली आधुनिक मेट्रो सिस्टम में से एक है. इसे बनाने और चलाने में कई देश और विशेषज्ञ मदद को आगे आए. इनमें सबसे प्रमुख सहयोगी था जापान. इस देश ने तकनीक दी. आर्थिक मदद दी. संस्थागत सहायता भी दी. आज दिल्ली मेट्रो का नेटवर्क लगभग 416 किलो मीटर का है. कुल दर्जन भर रूटस पर मेट्रो चल रही हैं. तीन सौ से ज्यादा स्टेशन सक्रिय हैं. आज दिल्ली मेट्रो रोज 65-70 लाख लोगों की यात्रा को सुगम बना रही है. जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची भारत के दौरे पर हैं. आइए, इसी बहाने दिल्ली मेट्रो की पूरी कहानी को समझते हैं, जिसके विकास में शुरू से आज तक जापान का बड़ा योगदान है.
1990 के दशक में दिल्ली में ट्रैफिक बढ़ रहा था. सड़कें जाम होना आम था. हवा का प्रदूषण बढ़ रहा था. पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहद कमजोर था. केवल बसें थीं, जो पर्याप्त नहीं थीं. दिल्ली सरकार ने बड़े पैमाने पर मास ट्रांजिट की योजना बनानी शुरू की. इसका उद्देश्य था भीड़ घटाना और सफर तेज करना. इन्हीं प्रयासों के बीच जापान सामने आया. दोनों देशों के बीच अच्छे राजनयिक संबंध पहले से थे. जापानी एजेंसियाँ और बैंक मदद के लिए तैयार हुए. जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी ने परियोजना की शुरुआती स्टडी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. तकनीकी सलाह और फायदे-नुकसान का विश्लेषण भी किया.
कब शुरू हुआ दिल्ली मेट्रो का निर्माण?जापानी अधिकारियों, इंजीनियरों और भारत के मेट्रो मैन कहे जाने वाले ई. श्रीधरन के नेतृत्व में दिल्ली मेट्रो का निर्माण एक अक्टूबर 1998 को औपचारिक रूप से शुरू हुआ. मतलब कई साल लगे इस परियोजना को अंतिम रूप देने में. इस प्रोजेक्ट को अंजाम तक पहुंचाने के लिए दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार का संयुक्त उद्यम दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन का गठन पहले ही 3 मई 1995 को कर लिया गया था.
भारत के दौरे पर जापान की PM ताकाइची. फोटो: PTI
पहली मेट्रो कब चली?बेहद सीमित समय में पहली मेट्रो सेवा 24 दिसंबर 2002 को शुरू हुई. लगभग चार साल का समय लगाकर दिल्ली का यह सपना अफसरों ने पूरा कर लिया. पहला परिचालन सेक्शन रेड लाइन का एक हिस्सा था. शाहदरा से तीस हज़ारी तक पहली मेट्रो चली थी. यह लगभग 8.35 किलो मीटर लंबा रूट है, जो एलिवेटेड है. बाद में इसमें एक के बाद एक, नए रूट जुडते गये और आज दिल्ली मेट्रो केन्द्रीय राजधानी की लाइफ लाइन के रूप में स्थापित है.
जापान ने कर्ज दिया, अनुदान और साधन भीदिल्ली मेट्रो के निर्माण के लिए भारी पूंजी चाहिए थी. जापान ने बेहद कम-ब्याज वाले ऋण दिए. जापानी बैंक और सरकार ने बड़े कर्ज उपलब्ध कराए. ये ऋण दीर्घकालिक और अनुकूल शर्तों पर थे. इससे परियोजना के वित्तीय बोझ को संभालना आसान हुआ. कुछ मामलों में तकनीकी सहायता के रूप में भी ग्रांट मंजूर की. जापान से आधुनिक मेट्रो तकनीक मिली. इसमें ट्रैक डिजाइन, सिग्नलिंग सिस्टम, और ट्रेन कंट्रोल प्रणाली शामिल थी. जापानी कंपनियों ने रोलिंग स्टॉक की आपूर्ति में मदद की. वे ट्रेन के डिजाइन और भरोसेमंद इंटीरियर्स के लिए जाने जाते थे. जापान के विशेषज्ञों ने भारतीय इंजीनियरों को समुचित ट्रेनिंग भी दी. आज जो मेट्रो का स्वरूप दिल्ली में दिखाई दे रहा है, उसमें जापान का बड़ा योगदान है.

जापान ने परियोजना प्रबंधन के अच्छे मॉडल सुझाए. दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन को परामर्श मिला कि कैसे समयबद्ध और लागत-नियंत्रित तरीके से काम करे. जीका और जापानी ठेकेदारों ने काम की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर ध्यान दिया. इससे दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन को मजबूत संस्थागत संस्कृति बनाने में मदद मिली. कई जापानी ठेकेदारों ने निर्माण में हिस्सा लिया. उन्होंने टनल बोरिंग मशीन और उन्नत शटरिंग तकनीक जैसी मशीनरी इस्तेमाल की. विशेषकर निचले स्तर के कार्यों और स्टेशन निर्माण में जापानी तकनीक बेहद उपयोगी रही. इससे काम तेज और सुसंगत हुआ.
सुरक्षा और संचालन के मानक तय किएजापानी अनुभव ने सुरक्षा मानकों को मजबूत किया. इमरजेंसी प्रक्रियाएं, फायर सेफ्टी और सर्विस रूटीन जापानी परामर्श से सुधरे. सिग्नलिंग और कंट्रोल सिस्टम में उच्च विश्वसनीयता आई. इसका प्रभाव यात्रियों के विश्वास पर पड़ा. जापानी सलाह ने स्टेशनों के आसपास के शहरी विकास पर भी ध्यान दिलाया. सहज कनेक्टिविटी, पैदल मार्ग, और इन्फ्रास्ट्रक्चर की रख-रखाव तरकीबों को अपनाया गया. इससे स्टेशन सिर्फ ट्रांजिट पॉइंट नहीं रहे, बल्कि आसपास के क्षेत्र के विकास को भी प्रेरित किया.
जापान से आधुनिक मेट्रो तकनीक मिली. फोटो: PTI
चुनौतियां आईं और समाधान भी निकलेपरियोजना के दौरान कई चुनौतियां आईं. लागत बढ़ना, जमीन अधिग्रहण के मसले, और समय-सीमा के दबाव थे. जापानी घटक अक्सर उच्च गुणवत्ता और समयबद्धता पर जोर देते थे. भारत और जापान ने मिलकर समाधान निकाले. कर्ज पुनर्संरचना, अनुबंध प्रबंधन और प्रभावी समन्वय से परियोजना आगे बढ़ी. दिल्ली मेट्रो का निर्माण कई चरणों में हुआ. पहले चरण में कुछ प्रमुख रूट्स बनाए गए. जापान के सहयोग ने पहले चरण को सफल बनाया. बाद के चरणों में भी जापानी बैंकिंग और तकनीकी भागीदारी रही. विस्तार के साथ नई लाइनों, अधिक ट्रेनों और बेहतर सिस्टम जोड़े गए.
मेट्रो ने रोज़गार पैदा किया तो आर्थिक लाभ भी हुआमेट्रो बनने से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ा. करियर बने, व्यापार बढ़ा और रोज़गार के अवसर मिले. जापानी निवेश ने स्थानीय निर्माण उद्योग और सप्लाई चेन को सक्रिय किया. लंबे समय में यातायात की लागत और समय घटने से आर्थिक लाभ हुआ. मेट्रो से कार और बसों पर निर्भरता कम हुई. इससे वायु प्रदूषण घटा. जापानी तकनीक के कारण ऊर्जा दक्षता बेहतर बनी. इलेक्ट्रिक ट्रेनें प्रदूषण कम करने में मददगार साबित हुईं. कल्पना करके मन सिहर उठता है कि अगर मेट्रो नहीं होती तो आज दिल्ली का क्या हाल होता? ट्रैफिक किस रूप में हमारे सामने होता?
मेट्रो के बाद देश की पहली बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में भी जापान मदद कर रहा है. फोटो: Getty Images
दिल्ली मेट्रो ने मजबूत किए दोनों देशों के रिश्तेदिल्ली मेट्रो परियोजना ने भारत-जापान संबंधों को मजबूत किया. दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ा. जापान ने अन्य भारतीय शहरों में भी सलाह दी. अनुभव साझा करने से दोनों देशों को लाभ हुआ. देश की पहली बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को भी जापान मदद कर रहा है, जो अहमदाबाद से मुंबई के बीच बन रही है. इस प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार ने नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड का गठन किया है. वही बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही है.
आज दिल्ली मेट्रो एक बड़ी और विकसित नेटवर्क बन चुकी है. नई लाइनों का निर्माण और विस्तार जारी है. जापान का सहयोग शुरुआती और कई माध्यमों से सतत रहा. भविष्य में भी तकनीकी साझेदारी और वित्तीय सहयोग की संभावना बनी हुई है. जापान ने दिल्ली मेट्रो को बनाने में कई तरह से मदद की. उन्होंने आर्थिक सहायता दी. तकनीकी ज्ञान साझा किया. प्रशिक्षण और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में सहयोग किया. इससे दिल्ली में एक विश्वस्तरीय मेट्रो सिस्टम बना. यह सहयोग एक सफल अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का उदाहरण है.
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