बेटे की मौत के बाद अंतिम दर्शन के लिए बिलख रही 75 वर्षीय मां… इटली में हुई मौत, 22 दिन से मोर्चरी में रखा शव
TV9 Bharatvarsh July 04, 2026 10:43 PM

Sriganganagar News: राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले से एक बेहद भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है. रामसिंहपुर की रहने वाली 75 वर्षीय सुखदेव कौर का बेटा बेहतर भविष्य की तलाश में सात साल पहले डंकी रूट के जरिए विदेश गया था. लेकिन अब उसकी मौत के 22 दिन बाद भी शव भारत नहीं पहुंच पाया है. आर्थिक तंगी से जूझ रहा परिवार अंतिम दर्शन तक नहीं कर सका है और मां बेटे के शव के इंतजार में बिलख रही है.

जानकारी के अनुसार, सुखदेव कौर के पति मीत सिंह का वर्ष 2009 में निधन हो गया था. इसके बाद वह अपने दोनों बेटों के सहारे जीवन यापन कर रही थीं. वर्ष 2019 में बड़े बेटे सुखवंत सिंह ने विदेश जाने का फैसला किया. परिवार ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन बेहतर भविष्य की उम्मीद में वह डंकी रूट से कई देशों का सफर करते हुए आखिरकार इटली पहुंच गया.

परिजनों के मुताबिक, 10 जून को इटली की राजधानी रोम में सुखवंत सिंह को अचानक हार्ट अटैक आया, जिससे उसकी मौत हो गई. विडंबना यह रही कि महज 18 दिन बाद, यानी 28 जून को उसे इटली की नागरिकता मिलने वाली थी. लेकिन उससे पहले ही उसकी जिंदगी खत्म हो गई.

छोटे भाई की आंखों से झलका दर्द

मृतक के छोटे भाई बबलू ने बताया कि पिछले 22 दिनों से सुखवंत का शव रोम के एक अस्पताल की मोर्चरी में रखा हुआ है. शव को भारत लाने में लाखों रुपये का खर्च आएगा, जिसे उठाने की परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं है. उन्होंने बताया कि भाई ने जो भी कमाई की थी, वह इटली की नागरिकता संबंधी प्रक्रिया में खर्च हो गई. घर बनाने के लिए उसने कुछ पैसे जरूर भेजे थे, लेकिन अब परिवार के पास अंतिम संस्कार तक कराने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

20 दिन तक नहीं निकला घर से बाहर

भाई की मौत का सदमा इतना गहरा था कि बबलू करीब 20 दिन तक घर से बाहर नहीं निकल सका. अब घर का राशन खत्म होने पर वृद्ध मां सुखदेव कौर फिर से दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं. परिवार का कहना है कि उन्हें न तो सरकारी मदद मिली है और न ही शव को भारत लाने की प्रक्रिया की पूरी जानकारी है.

सुखदेव कौर की एक ही इच्छा है कि उनके बेटे का शव जल्द से जल्द भारत लाया जाए, ताकि वह अंतिम बार उसका चेहरा देख सकें और पूरे रीति-रिवाज के साथ उसका अंतिम संस्कार कर सकें. यह घटना विदेश में काम करने वाले भारतीयों और उनके परिवारों की कठिन परिस्थितियों को भी उजागर करती है.

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