धरती नहीं, अंतरिक्ष में बनेंगे डेटा सेंटर! क्या है इसके पीछे की वजह? आम आदमी पर क्या पड़ेगा असर
TV9 Bharatvarsh July 06, 2026 10:43 PM

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की तेजी से बढ़ती मांग अब धरती पर मौजूद डेटा सेंटरों के लिए नई चुनौती बन रही है. बिजली, कूलिंग सिस्टम और जमीन की जरूरत लगातार बढ़ रही है, जिससे टेक कंपनियां अब अंतरिक्ष में एआई डेटा सेंटर बनाने की संभावना तलाश रही हैं. फिलहाल यह विचार शुरुआती दौर में है, सरकारें, स्टार्टअप और बड़ी टेक कंपनियां इसे भविष्य की कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा मानकर काम कर रही हैं. चलिए जानते हैं कि आखिर अंतरिक्ष में एआई डेटा सेंटर बनाने के क्या फायदे और नुकसान हैं.

डेटा सेंटर क्या होता है?

आईबीएम के मुताबिक, डेटा सेंटर वह जगह होती है जहां सर्वर, स्टोरेज और नेटवर्किंग उपकरण रखे जाते हैं. यही केंद्र वेबसाइट, क्लाउड सेवाओं, ऑनलाइन स्टोरेज और एआई जैसी डिजिटल सेवाओं को चलाते हैं. जब भी कोई व्यक्ति एआई चैटबॉट का इस्तेमाल करता है, फिल्म स्ट्रीम करता है या क्लाउड पर फोटो सेव करता है, तो उसका डेटा इन्हीं सेंटरों में प्रोसेस होता है. लेकिन जेनरेटिव एआई मॉडल को ट्रेन करने और हर सवाल का जवाब देने के लिए हजारों हाई परफॉर्मेंस जीपीयू लगातार काम करते हैं. इससे बिजली की खपत, गर्मी और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है.

आखिर अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाने का विचार क्यों आया?

ब्लूमबर्ग और एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, धरती पर बिजली, जमीन और कूलिंग की बढ़ती समस्या ने कंपनियों को नए विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है. अंतरिक्ष में लंबे समय तक लगातार सौर ऊर्जा मिल सकती है, वहां जमीन की कमी नहीं है और वातावरण बेहद ठंडा होने के कारण तापमान कंट्रोल करने में भी मदद मिल सकती है. कंपनियों की मानना है कि बड़े सोलर पैनल से लैस सैटेलाइट एआई चिप्स को ऊर्जा देंगे. धरती से लेजर कम्युनिकेशन के जरिए अनुरोध भेजे जाएंगे, जिनका जवाब कुछ मिलीसेकंड में वापस भेजा जा सकेगा. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि निकट भविष्य में यह धरती के डेटा सेंटरों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनके पूरक के रूप में काम कर सकता है.

तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं

सीएनबीसी और ब्लूमबर्ग के मुताबिक, अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाना आसान नहीं है. सबसे बड़ी चुनौती हजारों एआई प्रोसेसर को लगातार बिजली उपलब्ध कराना, उनके लिए विशाल सोलर पैनल तैयार करना और बिना हवा वाले वातावरण में चिप्स की गर्मी बाहर निकालना है. इसके अलावा हजारों सैटेलाइट के बीच तेज और भरोसेमंद लेजर कम्युनिकेशन बनाए रखना भी बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है. आर्थिक रूप से भी सैटेलाइट बनाना, उन्हें लॉन्च करना, उनका रखरखाव, बीमा और संचार व्यवस्था काफी महंगी है. इसलिए फिलहाल धरती पर बने डेटा सेंटर ज्यादा व्यावहारिक और सस्ते माने जा रहे हैं.

स्पेस डेटा सेंटर की दौड़ में कौन आगे और भारत की क्या तैयारी है?

सीएनबीसी के अनुसार, स्पेसएक्स, ब्लू ओरिजिन और गूगल जैसी कंपनियां अंतरिक्ष आधारित कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम कर रही हैं. ब्लू ओरिजिन ने प्रोजेक्ट सनराइज के तहत 51,600 डेटा सेंटर सैटेलाइट लॉन्च करने की योजना पेश की है. वहीं मनीकंट्रोल और केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता. मई 2026 में सर्वोम एआई और स्पेसटेक कंपनी पिक्सेल ने मिलकर पाथफाइंडर नाम का भारत का पहला ऑर्बिटल डेटा सेंटर सैटेलाइट विकसित करने की साझेदारी की. इसका उद्देश्य अंतरिक्ष में ही एआई मॉडल की ट्रेनिंग और प्रोसेसिंग करना है, ताकि विदेशी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता कम की जा सके. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में अंतरिक्ष आधारित डेटा सेंटर तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक डिजिटल प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं.

आम यूजर्स को इसका क्या नुकसान होगा?

अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाने से आम लोगों को तुरंत तो कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन आने वाले समय में इससे कुछ बड़ी परेशानियां और चुनौतियां सामने आ सकती हैं.

1. इंटरनेट की रफ्तार में थोड़ी सुस्ती (Latency Issues)

डेटा सेंटर पृथ्वी से बहुत दूर अंतरिक्ष में होंगे. भले ही डेटा प्रकाश (Light) की रफ्तार से सफर करे, लेकिन इतनी लंबी दूरी तय करने में कुछ मिलीसेकंड का समय लगेगा. इस वजह से लाइव ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो कॉलिंग जैसी चीजों में थोड़ी रुकावट या देरी महसूस हो सकती है.

2. अंतरिक्ष में कचरा बढ़ेगा (Space Debris)

अंतरिक्ष में जितने ज्यादा डेटा सेंटर और सैटेलाइट भेजे जाएंगे, वहां कचरा (मलबे) का खतरा उतना ही बढ़ेगा. अगर ये सैटेलाइट्स आपस में टकराते हैं, तो इनसे पैदा होने वाला मलबा दूसरे संचार (Communication) सैटेलाइट्स को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे हमारी जीपीएस और टीवी जैसी सेवाएं ठप हो सकती हैं.

3. आपकी जेब पर बढ़ेगा बोझ

अंतरिक्ष में सर्वर भेजना, उन्हें चालू रखना, बिजली देना और गर्म होने से बचाना (ठंडा रखना) बेहद महंगा काम है. कंपनियों का यह भारी-भरकम खर्च आखिरकार आम जनता की जेब से ही निकलेगा. इसका नतीजा यह हो सकता है कि आपको इंटरनेट और क्लाउड स्टोरेज (जैसे Google Drive या iCloud) के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ें.

4. मौसम और सौर तूफानों का खतरा

अंतरिक्ष का मौसम हमेशा एक जैसा नहीं रहता. वहां आने वाले सौर तूफान (Solar Storms) और खतरनाक किरणें इन डेटा सेंटर्स को नुकसान पहुंचा सकती हैं. इससे आपका डेटा गायब होने या इंटरनेट सेवाएं अचानक बंद होने का डर बना रहेगा. आसान भाषा में कहें तो, अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाने से तकनीक भले ही आधुनिक हो जाए, लेकिन यह इंटरनेट को महंगा, थोड़ा धीमा और जोखिम भरा भी बना सकता है.

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