नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन यानी NATO का दो दिवसीय शिखर सम्मेलन इस बार तुर्की की राजधानी अंकारा में आयोजित किया जा रहा है. इससे पहले साल 2004 में भी पहली बार तुर्की ने इस महत्वपूर्ण आयोजन की मेजबानी की थी. इस कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प समेत 32 देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा ले रहे हैं. आइए, समझते हैं कि इतना महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन यूरोप, अमेरिका में न होकर तुर्की में क्यों हो रहा है?
नाटो दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य गठबंधन है. इसमें यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई देश शामिल हैं. हर साल या कई बार जरूरत पड़ने पर नाटो का शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाता है. इसमें सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकारों के प्रमुख शामिल होते हैं. वे सुरक्षा, रक्षा और वैश्विक चुनौतियों पर फैसले लेते हैं. इस बार यह शिखर सम्मेलन तुर्की में आयोजित हो रही है. इसके पीछे कई अहम कारण सामने आ रहे हैं.
नाटो सिर्फ यूरोप का संगठन नहीं है. इसमें यूरोप के साथसाथ अमेरिका और कनाडा भी सदस्य हैं. इसलिए इसकी बैठकों का आयोजन केवल पश्चिमी यूरोप तक सीमित नहीं रहता. सदस्य देश बारीबारी से मेजबानी करते हैं. इसी परंपरा के तहत इस बार तुर्की को मेजबानी मिली है.
तुर्की क्यों है इतना महत्वपूर्ण?तुर्की नाटो के सबसे अहम देशों में गिना जाता है. यह देश इस संगठन के संस्थापक देशों में है. तुर्की 18 फरवरी 1952 को इस संगठन से जुड़ा था. अमेरिका के बाद सदस्य देशों में तुर्की की सेना सबसे बड़ी है. तुर्की यूरोप और एशिया के बीच स्थित है. इसकी सीमा काला सागर, मध्य पूर्व और भूमध्य सागर से जुड़ती है. यह रूस, यूक्रेन, सीरिया और ईरान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के बेहद करीब है. यही वजह है कि सुरक्षा के लिहाज से तुर्की की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है.
तुर्की 18 फरवरी 1952 को इस संगठन से जुड़ा था. फोटो: Pexels
सिर्फ मेजबानी नहीं, रणनीतिक संदेश भीनाटो का मानना है कि मौजूदा समय में सुरक्षा चुनौतियां केवल यूरोप तक सीमित नहीं हैं. इससे इतर भी हैं. रूसयूक्रेन युद्ध जारी है. मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है. काला सागर क्षेत्र भी रणनीतिक रूप से बेहद अहम बन चुका है. ऐसे में तुर्की में समिट आयोजित करना यह संदेश भी देता है कि नाटो अपने दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्रों पर भी बराबर ध्यान दे रहा है.
क्या तुर्की और नाटो के रिश्ते हमेशा आसान रहे?तुर्की और नाटो के रिश्ते में खटास भी आई है. पिछले कुछ वर्षों में तुर्की और कई पश्चिमी देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं. स्वीडन को नाटो की सदस्यता, सीरिया नीति, रूस से एस400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की खरीद और मानवाधिकार से जुड़े अनेक मुद्दों की वजह से तनाव रहा है. इसके बावजूद तुर्की नाटो का महत्वपूर्ण सदस्य बना हुआ है. गठबंधन मानता है कि तुर्की की भौगोलिक स्थिति और सैन्य क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई थी. फोटो: Getty Images
साल 2026 समिट में किन मुद्दों पर चर्चा हो सकती है?अंतिम एजेंडा बैठक के समय तय होता है, लेकिन जो प्रमुख मुद्दे शामिल हो सकते हैं उनमें यूरोप की सामूहिक सुरक्षा, रूसयूक्रेन युद्ध, रक्षा बजट, रक्षा उद्योग में सहयोग, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई सैन्य तकनीक, आतंकवाद से मुकाबला और नाटो की भविष्य की रणनीति प्रमुख हैं.
इस आयोजन से तुर्की को क्या मिलेगा?इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन से तुर्की को कई लाभ मिलते हैं. उसकी वैश्विक छवि मजबूत होती है. वह अपनी कूटनीतिक भूमिका को और मजबूत कर सकता है. दुनिया के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी से तुर्की को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अधिक महत्व मिलता है. समिट के साथ ही NATO समिट डिफेंस इंडस्ट्री फोरम भी अंकारा में हो रहा है, जो ट्रांसअटलांटिक डिफेंस प्रोडक्शन, निवेश और इनोवेशन पर NATO का सबसे बड़ा हाईलेवल इवेंट है. यह तुर्की की डिफेंस इंडस्ट्री को सीधे निवेश और साझेदारी के मौके देता है.
इस महत्वपूर्ण संगठन की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई थी. वर्तमान में इस संगठन के कुल 32 सदस्य देश हैं. यह उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों के महत्वपूर्ण संगठन है. इसकी स्थापना वाशिंगटन संधि पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी. इसका मुख्यालय बेल्जियम के ब्रूसेल्स में है.
नाटो समिट कहांकहां हुई?तुर्की के महत्वपूर्ण शहर इस्तांबुल में पहली बार नाटो का शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था. इसी बैठक में मध्य पूर्व के देशों के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए इस्तांबुल कोऑपरेशन इनिशिएटिव की शुरुआत की गई थी.
सरल शब्दों में कहें तो तुर्की में नाटो समिट होना केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं है. यह एक बड़ा रणनीतिक संकेत भी है. तुर्की यूरोप और एशिया के बीच पुल की भूमिका निभाता है. उसकी सैन्य क्षमता, भौगोलिक स्थिति और क्षेत्रीय प्रभाव नाटो के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, इसलिए गठबंधन ने 2026 की समिट के लिए अंकारा को चुना है. आने वाले वर्षों में रूसयूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व की स्थिति, रक्षा खर्च, साइबर सुरक्षा और नई सैन्य तकनीकों जैसे मुद्दे नाटो की प्राथमिकताओं में बने रहेंगे. ऐसे में अंकारा समिट पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी.