अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्किए की राजधानी अंकारा में एक ऐसा बयान दे दिया है, जिससे पूरी दुनिया में खलबली मच गई है.मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि उनका मानना है कि ईरान के साथ हुआ मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) अब खत्म हो चुका है. हालिया घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच हुए इस समझौते का कोई महत्व नहीं रह गया है.ईरान के साथ डील करना सिर्फ समय बर्बाद करना है.
ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर टूटने पर सबसे ज्यादा फजीहत पाकिस्तान की हो रही है. दरअसल, पाकिस्तान की मध्यस्थता में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच हुए अंतरिम युद्धविराम समझौते का मकसद एक स्थायी समझौते के लिए बातचीत के वास्ते 60 दिन का समय देना था. लेकिन कतर में हुई अप्रत्यक्ष बातचीत पिछले हफ्ते बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई. मंगलवार यानी 07 जुलाई को अमेरिका ने सीजफायर तोड़ते हुए ईरान पर हमला कर दिया है.
क्या एक बार फिर शुरू हो सकती है जंग?सबसे पहले ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने मंगलवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास सऊदी अरब और कतर के तेल और दो गैस टैंकरों पर मिसाइलें दाग कर हमला कर दिया है. फिर जवाबी कार्रवाई में अमेरिका ने ईरान पर ताबड़तोड़ अटैक किए. फिर, अब डोनाल्ड ट्रंप ने समझौता टूटने का ऐलान कर दिया है. ऐसे में अगर एक बार फिर जंग आगे बढ़ती है तो आर्थिक मोर्च पर दुनिया के सामने बड़़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती है.
ईरान-अमेरिका के समझौते का पाकिस्तान ने खूब लिया था श्रेयपाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का खूब श्रेय लिया था. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से लेकर उनकी सरकार के मंत्रियों ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर खूब पोस्ट किए थे. खुद की तारीफ में कसीदे पर कसीदे पढ़ डाले थे. लेकिन अब जब कि ईरान-अमेरिका के बीच समझौता टूटता हुआ दिख रहा है तो पाकिस्तान पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं.
पाकिस्तान के मध्यस्थ की भूमिका पर भी सवालसबसे बड़ा सवाल ईरान-अमेरिका के बीच समझौते में पाकिस्तान की हैसियत को लेकर है. ईरान ने सऊदी अरब और कतर के तेल टैंकरों पर हमला कर दिया. लेकिन मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान की तरफ से इसके खिलाफ एक शब्द सामने नहीं आया. वहीं, अब जब अमेरिका ने समझौता तोड़ दिया है, तो यूनाइटेड स्टेट के एहसानों के तले दबे पाकिस्तान के बोल निकल हीं नहीं सकते हैं.
समझौता टूटने पर पाकिस्तान की तरफ से चुप्पी साधने का क्या कारण है?दरअसल, पाकिस्तान अमेरिका के हमलों के खिलाफ इसलिए नहीं बोल सकता क्योंकि वह चाहता है कि यूनाइटेड स्टेट्स के साथ उसका आर्थिक सहयोग बना रहे हैं. वहीं, ईरान की तरफ से किए गए हमलों के खिलाफ वह इसलिए बोलने से बच रहा है क्योंकि वह चाहता है कि ईरान के साथ सीमा सुरक्षा और ऊर्जा सहयोग जारी रहे. दूसरा ईरान एक इस्लामिक राष्ट्र माना जाता है. पाकिस्तान भी एक इस्लामिक राष्ट्र है. ऐसे में वह ईरान के खिलाफ जाकर अपनी आवाम की आलोचना का सामना नहीं करना चाहता है. इसके अलावा ईरान-चीन का अहम सहयोगी है. ईरान के खिलाफ जाकर वह चीन को भी नाराज नहीं करना चाहता है, वरना उसे आर्थिक तौर पर भारी नुकसान हो सकता है,