होर्मुज पर संकट, किसकी तेल सप्लाई सबसे ज्यादा प्रभावित होगी?
TV9 Bharatvarsh July 09, 2026 12:43 AM

अमेरिका के हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है. इस अहम समुद्री रास्ते पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और आशंका जताई जा रही है कि अगर यहां आवाजाही प्रभावित होती है, तो दुनिया के तेल कारोबार पर बड़ा असर पड़ सकता है. हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य कुछ समय के लिए भी बंद हो जाए, तो सबसे ज्यादा नुकसान किस देश को होगा? पहली नजर में लोग ईरान का नाम लेते हैं, लेकिन तेल निर्यात के आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं.

केप्लर (Kpler) के जून महीने के आंकड़ों के मुताबिक, होर्मुज के रास्ते सबसे ज्यादा तेल भेजने वाले देशों में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे आगे हैं. ऐसे में अगर यह समुद्री रास्ता बाधित होता है, तो इन दोनों देशों की तेल सप्लाई और अरबों डॉलर की कमाई पर सबसे बड़ा असर पड़ सकता है. वहीं, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने और ऊर्जा संकट गहराने की आशंका भी बढ़ जाएगी. अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है या वहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो सबसे बड़ा असर तेल निर्यात करने वाले खाड़ी देशों पर पड़ सकता है.

कितना तेल किया सप्लाई?

सऊदी अरब हर दिन करीब 45 लाख बैरल तेल की सप्लाई करता है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) लगभग 38 लाख बैरल प्रतिदिन तेल निर्यात करता है. वहीं, ईरान का दैनिक तेल निर्यात करीब 10 लाख बैरल है. इसके अलावा कुवैत और इराक भी रोजाना करीब 5-5 लाख बैरल तेल का निर्यात करते हैं. ऐसे में इस समुद्री मार्ग में किसी भी तरह की रुकावट इन देशों की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ वैश्विक तेल बाजार और सप्लाई चेन पर भी बड़ा असर डाल सकती है.

दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

इन आंकड़ों से साफ है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर सबसे ज्यादा निर्भरता सऊदी अरब और यूएई की है. इन देशों के तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया के बाजारों तक पहुंचता है. अगर यह मार्ग बंद होता है या जहाजों की आवाजाही धीमी पड़ती है, तो सबसे पहले इन्हीं देशों की सप्लाई प्रभावित होगी. होर्मुज दुनिया के सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्गों में से एक है. एशिया, यूरोप और दूसरे देशों तक खाड़ी का तेल पहुंचाने में इसकी अहम भूमिका है. यदि यहां तनाव बढ़ता है, तो जहाजों की आवाजाही महंगी और धीमी हो सकती है. इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा, जिसका बोझ अंततः तेल आयात करने वाले देशों और आम उपभोक्ताओं को उठाना पड़ सकता है.

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