कॉम्प्लिमेंट्री ऑफर के बाद सॉफ्टवेयर सर्विसेज का बिजनेस नहीं पकड़ रहा रफ्तार, ऑटो कंपनियां परेशान
TV9 Bharatvarsh July 12, 2026 01:43 PM

भारत में कनेक्टेड कारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है. अब नई कारों में इंटरनेट की मदद से चलने वाले कई स्मार्ट फीचर मिलते हैं. जैसे मोबाइल से कार लॉक या अनलॉक करना, दूर से एसी चालू करना, कार की लोकेशन देखना. शुरुआत में ये सुविधाएं ग्राहकों को कुछ साल तक मुफ्त दी जाती हैं, लेकिन इसके बाद इनका इस्तेमाल जारी रखने के लिए पैसे देने पड़ते हैं.

ऑटो कंपनियों की मुश्किल शुरू

यहीं से ऑटो कंपनियों की मुश्किल शुरू होती है. मुफ्त समय खत्म होने के बाद बहुत कम ग्राहक इन सेवाओं का भुगतान करना चाहते हैं. इससे कंपनियों की सॉफ्टवेयर और डिजिटल सेवाओं से कमाई की उम्मीद पूरी नहीं हो पा रही है.ऑटो सेक्टर के जानकारों का कहना है कि अब सिर्फ ज्यादा फीचर देना काफी नहीं है. कंपनियों को ऐसी डिजिटल सेवाएं बनानी होंगी, जिनका इस्तेमाल लोग रोज करना चाहें और उनके बिना काम अधूरा लगे. तभी ग्राहक हर साल या हर महीने इनकी फीस देने के लिए तैयार होंगे.

कंपनियों का बयान

दुनिया भर में करोड़ों कनेक्टेड कारें सड़कों पर दौड़ रही हैं. भारत में भी इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है. खासकर इलेक्ट्रिक वाहनों के आने के बाद बैटरी की जानकारी, चार्जिंग की स्थिति और रास्ते की योजना जैसी सुविधाओं का उपयोग पहले से ज्यादा होने लगा है.देश की बड़ी वाहन कंपनियां जैसे मारुति सुजुकी, हुंडई और टाटा मोटर्स अपनी कनेक्टेड कार सेवाएं एक से चार साल तक मुफ्त देती हैं. इसके बाद ग्राहक चाहें तो इनका सब्सक्रिप्शन लेकर सेवाएं जारी रख सकते हैं. हालांकि, कई कंपनियां यह नहीं बतातीं कि कितने लोग बाद में पैसे देकर इन सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कई मामलों में मुफ्त अवधि खत्म होने के बाद बहुत कम ग्राहक सब्सक्रिप्शन लेते हैं.

हुंडई के अनुसार, भारत में उसकी लाखों कनेक्टेड कारें चल रही हैं, लेकिन मुफ्त अवधि खत्म होने के बाद केवल करीब पांच में से एक ग्राहक ही भुगतान करके सेवा जारी रखता है. कंपनी का कहना है कि वह लगातार नए और बेहतर डिजिटल फीचर जोड़ रही है ताकि ग्राहकों का अनुभव और अच्छा हो.

ऑटो कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में लोग मोबाइल, इंटरनेट और दूसरे ऑनलाइन ऐप्स के लिए पैसे खर्च करते हैं. इसलिए समस्या पैसे देने की नहीं, बल्कि उपयोगिता की है. अगर कार के डिजिटल फीचर रोजमर्रा की जरूरत बन जाएं, तो ज्यादा लोग उनका सब्सक्रिप्शन लेना पसंद करेंगे. फिलहाल ऑटो कंपनियों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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