Ethanol Controversy : इथेनॉल के खिलाफ बोलने पर कब एफआईआर हो सकती है?
TV9 Bharatvarsh July 16, 2026 09:43 PM

इथेनॉल, E-20 पॉलिसी आने के बाद से ही इसकी सोशल मीडिया पर काफी आलोचना हो रही है. माइलेज घटने का दावा करते हुए लोग वीडियो बनाकर अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं. कंपनियां बयान दे रही हैं. सरकार भी बोल रही है कि माइलेज पर थोड़ा असर जरूर पड़ेगा मगर बहुत असर नहीं होगा. पॉलिसी को केंद्रीय मंत्रीय नितिन गडकरी को ट्रोलिंग भी झेलनी पड़ रही है. अब इस पूरे मामले पर कानूनी कार्रवाई भी शुरू हुई है.

नागपुर की साइबर पुलिस ने 4 कंटेंट क्रिएटर्स के ऊपर FIR दर्ज की है, जिनमें मनीष कश्यप का भी नाम शामिल है. पुलिस ने नागपुर के बीजेपी सोशल मीडिया कंवेनर की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की, जिनमें उन्होंने कहा कि पॉलिसी को लेकर मिसलीडिंग बातें फैलाई जा रही हैं. नितिन गडकरी को टारगेट किया जा रहा है. अब सवाल यहां ये बनता है कि इथेनॉल के खिलाफ बोलने पर FIR कब हो सकती है? क्या सरकार की पॉलिसी के खिलाफ नहीं बोला जा सकता है. इससे जुड़े कानूनी नियम क्या हैं? आइए इन सभी को विस्तार से समझते हैं.

बोलने की है आजादी

इस पर सुप्रीम कोर्ट के वकील ध्रुव गुप्ता का कहना है कि सिर्फ किसी यूनियन मिनिस्टर से सवाल करना या सरकार की पॉलिसी की आलोचना करना अपने आप में, भारतीय कानून के तहत कोई क्रिमिनल ऑफेंस नहीं है. संविधान का आर्टिकल 19(1)(a) हर नागरिक को बोलने और बोलने की आजादी का फंडामेंटल राइट देता है, जिसमें बिना किसी शक के सरकार, उसकी पॉलिसी और सरकारी अधिकारियों की आलोचना करने का अधिकार शामिल है.

  • इस राइट पर कोई भी रोक पूरी तरह से आर्टिकल 19(2) के दायरे में आनी चाहिए, जो सिर्फ कुछ खास वजहों जैसे कि बदनामी, पब्लिक ऑर्डर, किसी अपराध के लिए उकसाना, भारत की सॉवरेनिटी और इंटीग्रिटी, या राज्य की सिक्योरिटी पर ही सही रोक लगाने की इजाजत देता है.
  • उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने लगातार माना है कि डेमोक्रेटिक पॉलिटिक्स में सरकारी अधिकारियों पर पब्लिक की ज्यादा जांच और आलोचना होती है और आलोचना, चाहे कितनी भी तीखी या अजीब क्यों न हो, सिर्फ इसलिए क्रिमिनल नहीं की जा सकती क्योंकि वह पब्लिक ऑफिस में बैठे लोगों के खिलाफ है.

कब हो सकता है केस

ध्रुव गुप्ता ने बताया कि आर्टिकल 19(1)(a) के तहत मिला कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोटेक्शन ऐसे भाषण पर लागू नहीं होता जो साफ तौर पर झूठा, गलत इरादे वाला हो या आर्टिकल 19(2) के तहत माने गए एक्सेप्शन में आता हो. इसलिए सिर्फ इसलिए क्रिमिनल लायबिलिटी नहीं बन सकती क्योंकि किसी व्यक्ति ने सरकार की इथेनॉल पॉलिसी का विरोध किया है या उस पर सवाल उठाया है या किसी यूनियन मिनिस्टर की आलोचना की है. प्रॉसिक्यूशन को यह साबित करना होगा कि जिस भाषण पर सवाल उठाया गया है, वह किसी खास सज़ा के नियम के तहत आता है, जैसे, भारतीय न्याय संहिता, 2023 के सेक्शन 356-359 के तहत क्रिमिनल मानहानि या तथ्यों के आधार पर कानूनी तौर पर बनाया गया कोई दूसरा अपराध.

एक्सपर्ट ने कहा कि FIR की लीगैलिटी आखिर में आलोचना के तथ्य पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रॉसिक्यूशन यह दिखा पाता है या नहीं कि जिन बयानों पर सवाल उठाया गया है, वे कॉन्स्टिट्यूशनल लिमिट पार करके प्रोटेक्टेड पॉलिटिकल स्पीच से कानूनी तौर पर माने गए क्रिमिनल अपराध बन गए हैं. FIR का रजिस्टर होना सिर्फ एक इन्वेस्टिगेशन शुरू करना है और इसे अपने आप में क्रिमिनैलिटी का पता लगाना नहीं माना जा सकता.

नितिन गडकरी ने भी FIR की चेतावनी

केंद्रीय मंत्री और उनके बेटे को लेकर तमाम सोशल मीडिया पर वायरल है कि इससे उनके बेटे की कमाई बढ़ रही है. इस पर रियेक्ट करते हुए हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मेरे बेटे निखिल गडकरी की कंपनी की आय और मुनाफे को लेकर जो आंकड़े बताए जा रहे हैं, वे सही नहीं हैं. उन्होंने एंकर से कहा कि जहां से भी ये डेटा लिए गए हों अगर उसे दोबारा दोहराया गया तो वह मानहानि का केस कर सकते हैं.

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