India EV Market Growth: बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दामों के चलते अब लोग इलेक्ट्रिक गाड़ियों को ज्यादा महत्व दे रहे हैं. जिसके चलते आजकल मार्केट में हमें इलेक्ट्रिक गाड़ियां ज्यादा देखने को मिलती है. जबकि हाल ही में इंडिया एनर्जी स्टोरेज एलायंस की एक बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट दी है. जिसने पूरे ऑटो सेक्टर में हलचल मचा दी है.
नए रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2032 तक भारत का इलेक्ट्रिक व्हीकल बाजार करीब 12 गुना बढ़कर 3.04 करोड़ यूनिट्स सालाना की बिक्री तक पहुंच सकता है. बता दें कि, यह आंकड़ा सिर्फ एक अनुमान नहीं है बल्कि देश में तेजी से बदलती तकनीक का असर माना जा रहा है. तो चलिए जानतें हैं आख़िरकार इस रिपोर्ट में क्या खुलासा हुआ है.
बता दें कि, भारत में ईवी की डिमांड बहुत तेजी से बढ़ रही है. रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 में देश में जहां 20 लाख ईवी यूनिट्स बिकी थीं. वहीं, साल 2025 में यह आंकड़ा 26% की शानदार छलांग लगाते हुए 26 लाख यूनिट्स पर पहुंच गया था.
बस इतना ही नहीं देश में बिकने वाली कुल गाड़ियों में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की हिस्सेदारी भी 8.1% से बढ़कर सीधे 9.5% हो गई है. जिसका मतलब साफ है कि अब हर 10 में से लगभग 1 गाड़ी अब इलेक्ट्रिक बिक रही है.
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जानकारी दें दे कि, भारत में हो रही ईवी क्रांति की असली हीरो इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर हैं. साल 2025 में हुई कुल ईवी बिक्री में अकेले इलेक्ट्रिक स्कूटरों और बाइकों की हिस्सेदारी 60.1% रही है.
जबकि थ्री-व्हीलर्स गाड़ियों का योगदान 31.6% रहा था. इन दोनों ने मिलकर कुल बाजार के 91% से ज्यादा हिस्से पर अपना दबदबा जमा रखा है. वहीं अब इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी भी बढ़कर 7.7% हो गई है जो यह बताता है कि मिडिल परिवार भी अब इलेक्ट्रिक कारों को अपना रहा है.
आपको बता दें कि, जब इलेक्ट्रिक गाड़ियां की इतनी डिमांड बढ़ रही है तो उनमें लगने वाली बैटरियों की मांग में भी इजाफा होगा. रिपोर्ट के अनुसार देश में बैटरी की मांग साल 2025 की 19 GWh से बढ़कर 2032 तक 362 GWh तक पहुंच जाएगी. इसके साथ ही भारत का ईवी कंपोनेंट मार्केट जो अभी केवल 41,000 हजार करोड़ का है.
वह 38% की सालाना कंपाउंड ग्रोथ के साथ साल 2032 तक 3,02,000 करोड़ रुपये का विशाल बाजार बन सकता है. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत को अभी मोटर, कंट्रोलर और इनवर्टर जैसे पार्ट्स के घरेलू प्रोडक्शन पर बहुत काम करना होगा क्योंकि हम अभी भी इनके लिए काफी हद तक इंपोर्ट पर निर्भर हैं.
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