गुरुपूर्णिमा पर श्री श्री रविशंकर का संदेश, क्या जीवन में गुरु की आवश्यकता है?
Webdunia Hindi July 22, 2026 08:43 PM

एक बल्ब के भीतर तंतु (फ़िलामेंट) पहले से ही विद्यमान होता है। उसे केवल विद्युत् प्रवाह की आवश्यकता होती है और वह प्रकाशमान हो उठता है। उसी प्रकार एक कली में पुष्प बनने की समस्त संभावनाएं निहित रहती हैं, किन्तु उसके प्रस्फुटित होने के लिए थोड़ी सी देखभाल, जल, सूर्य का प्रकाश और अनुकूल वातावरण अपेक्षित होता है। ठीक इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर असीम सामर्थ्य और अनंत संभावनाएं संजोए हुए है। उचित मार्गदर्शन और अनुकूल वातावरण उस अंतर्निहित शक्ति को जागृत कर देते है, जो पहले से ही उसके भीतर विद्यमान है।

 

विद्युत् के बिना बल्ब का अपना कोई महत्व नहीं रह जाता। उसका बाहरी आकार मात्र एक आवरण है; वास्तविक तत्व तो उसके भीतर प्रवाहित होने वाली विद्युत् है। उसी प्रकार तुम भी केवल बाह्य आकार नहीं हो। तुम्हें यह अनुभूति करनी है कि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप वही चेतना है, वही दिव्य ऊर्जा है। जिस ज्ञान की तुम खोज कर रहे हो, वह पहले से ही तुम्हारे भीतर विद्यमान है। गुरु की उपस्थिति ही मनुष्य को अपने इस वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है।

 

जीवन में जो बातें प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं, उनके लिए भी हम मार्गदर्शक की आवश्यकता सहज स्वीकार करते हैं। वाहन चलाना सीखने के लिए प्रशिक्षक चाहिए, किसी विषय में दुर्बलता हो तो शिक्षक या कोच की आवश्यकता पड़ती है। जब दृश्य जगत की छोटी-छोटी बातों के लिए भी मार्गदर्शक आवश्यक है, तब उस अदृश्य, सूक्ष्म और अव्यक्त सत्य की अनुभूति के लिए गुरु का महत्व कितना अधिक होगा! गुरु के बिना आत्मसाक्षात्कार अत्यंत कठिन प्रतीत होता है और गुरु के बिना ध्यान की गहराइयों तक पहुंचना भी सहज नहीं होता।

 

क्या आप जानते हैं कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी शिक्षा के लिए महर्षि सान्दीपनि का आश्रय ग्रहण किया था? भगवान श्रीराम ने भी महर्षि वशिष्ठ से जीवन का गहन ज्ञान प्राप्त किया। जब स्वयं अवतार पुरुषों ने गुरु की शरण ग्रहण की, तब सामान्य मनुष्य के लिए गुरु की आवश्यकता कितनी स्वाभाविक है।

 

यदि जीवन में उच्चतर चेतना, उत्कृष्टता और आत्मोन्नति प्राप्त करनी है, तो गुरु का होना अनिवार्य है। गुरु के बिना वास्तविक प्रगति संभव नहीं। गुरु–शिष्य परम्परा हमारी सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। यदि मानव जाति को आगे बढ़ना है, तो उसे इस प्राचीन ज्ञान-परम्परा को अपने साथ लेकर चलना होगा।

 

गुरु वह है जो आपके दुःख, कष्ट और पीड़ा को दूर करने का सामर्थ्य रखता है। गुरु वह है जो आपके जीवन में शांति का संचार करता है और निरंतर प्रगति की दिशा में आपका पथ प्रशस्त करता है। जीवन में कृतज्ञ होने के लाखों अवसर हैं और शिकायत करने के करोड़ों। शिकायतों की संख्या कृतज्ञता से कहीं अधिक प्रतीत होती है। किन्तु गुरु का सान्निध्य इन दोनों से भी परे ले जाता है। वह आपकी दृष्टि को एक ऐसे सत्य की ओर उन्मुख करता है, जहां जीवन का सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य बदल जाता है।

 

शास्त्रीय रसायन विज्ञान हमें प्रत्येक तत्व के गुणधर्मों का ज्ञान कराता है। कुर्सी मेज नहीं है, मेज द्वार नहीं है, यद्यपि वे सभी लकड़ी से बने हैं। जल एक तापमान पर बर्फ बन जाता है और दूसरे तापमान पर वाष्प। परन्तु जब चेतना की दृष्टि क्वांटम भौतिकी की ओर विकसित होती है, तब मनुष्य शास्त्रीय विज्ञान की सीमाओं से ऊपर उठकर उस सत्य का अनुभव करता है, जहां समस्त सृष्टि में एक ही चेतना का स्पंदन दिखाई देता है। स्वयं को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से अभिन्न जानने का अनुभव ही अद्वैत की अनुभूति है।

 

गुरु के तीन स्वरूप होते हैं। पहला उनका स्थूल, भौतिक स्वरूप; दूसरा उनका सूक्ष्म ऊर्जा-स्वरूप; और तीसरा उनका कारण या अदृश्य स्वरूप। करुणा के कारण यही अदृश्य सत्ता पहले सूक्ष्म ऊर्जा के रूप में प्रकट होती है और अंततः मानव रूप धारण कर साधकों का मार्गदर्शन करती है। गुरु की उपस्थिति जीवन की समस्त शिकायतों और समस्त उपलब्धियों, दोनों से कहीं अधिक महान होती है।

 

जब आप कहते हैं, 'मैं कृतज्ञ हूं', तब भी उसमें एक दूरी का भाव निहित रहता है। परन्तु गुरु तो आपके अपने ही सर्वोच्च, विराट और दिव्य स्वरूप का नाम है।

जैसे वायु चारों ओर व्याप्त रहती है, पर उसका अनुभव तभी होता है जब हम उसकी ओर सजग होते हैं। वैसे ही गुरु सदा हमारे साथ हैं, गुरु पूर्णिमा वह पावन दिवस है, जब हम इस दिव्य उपस्थिति का अनुभव करते हैं, उससे जुड़ते हैं और कृतज्ञता के भाव में डूब जाते हैं। यही अनुभूति हमें जीवन में आगे बढ़ाती है।

 

गुरु समस्त शोकों का हरण करते हैं। उनके सान्निध्य में आनंद स्वतः उमड़ पड़ता है, ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है और व्यक्ति की सुप्त प्रतिभाएं सहज ही प्रस्फुटित होने लगती हैं। हम सभी का जीवन अनगिनत आशीर्वादों से परिपूर्ण है। आज का यह पावन दिवस उन सभी कृपाओं का स्मरण करने, उन्हें हृदय से अनुभव करने और इस सत्य में उल्लसित होने का है कि हम वास्तव में परमात्मा की असीम कृपा से धन्य हैं।

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