देश में सबसे ज्यादा मूंग खरीद मध्य प्रदेश से, फिर भी किसान आंदोलन पर क्यों उतरे?
TV9 Bharatvarsh July 29, 2026 09:43 PM

मध्य प्रदेश को भारत का दाल का कटोरा कहा जाता है. यहां दलहन की फसलें यानीमूंग, उड़द और चने का उत्पादन सबसे अधिक होता है. खरीफ के सीजन में उगाई जाने वाली मूंग की फसल उनकी आय का एक अहम जरिया होती है. लेकिन इस बार मूंग की सरकारी खरीद शुरू होने से पहले ही मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के रास्ते पर हैं. मध्य प्रदेश के मूंग किसानों की मांग है कि उनकी 100 प्रतिशत फसल की खरीदी एमएसपी पर की जाए.खरीदी का कोटा और खरीद प्रक्रिया में तेजी लाई जाए.

सीजन 2025-26 में देशभर में मूंग खरीद के लिए मंजूर कुल 5.23 लाख मीट्रिक टन मात्रा में से अकेले मध्य प्रदेश को 4.54 लाख मीट्रिक टन से अधिक की मंजूरी दी गई है. यानी राष्ट्रीय स्तर पर मंजूर मात्रा का करीब 87 फीसदी हिस्सा मध्य प्रदेश के खाते में आया है. ऐसे में सवाल यह है कि जब मूंग खरीद का समझौता मध्य प्रदेश के किसानों से सबसे अधिक है, तो वह नाराज क्यों हैं. इसका जवाब मध्य प्रदेश में किसानों द्वारा उत्पादित कुल मूंग के आंकड़ों पर नजर डालते ही मिल जाएगा.

केंद्र सरकार हर साल मूल्य समर्थन योजना के तहत दलहन और तिलहन की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर करती हैं. पूरे देश के लिए 22 अनिवार्य कृषि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित हैं. इन 22 अनिवार्य फसलों में 14 खरीफ फसलें शामिल हैं, जैसे धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, तुअर (अरहर), मूंग, उड़द, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, नाइजरसीड और कपास, और 6 रबी फसलें, जैसे गेहूं, जौ, चना, मसूर (दाल), रेपसीड और सरसों, कुसुम, और दो वाणिज्यिक फसलें, जैसे जूट और खोपरा शामिल हैं.इस खरीद की जिम्मेदारी मुख्य रूप से नेफेड (NAFED) और राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ (NCCF) जैसी एजेंसियों के पास होती है.

मध्य प्रदेश में किसानों के आंदोलन की क्या वजह है?

खरीफ 2026 सीजन के लिए केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश से बड़ी मात्रा में मूंग खरीदने को मंजूरी दी है. देश में सबसे अधिक खरीद का लक्ष्य भी मध्य प्रदेश को मिला है, क्योंकि यहां मूंग का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है. लेकिन यह खरीद मध्य प्रदेश के कुल मूंग उत्पादन का सिर्फ 25 प्रतिशत ही है. इसका साफ अर्थ यह हुआ कि मध्य प्रदेश के किसानों को 75 प्रतिशत फसल को खुले बाजार में कम दामों पर बेचना पड़ता है. साथ ही खरीदी की प्रक्रिया धीमी होने के चलते भी फसल खराब होने की डर से भी कई किसानों को अपनी फसल को औने-पौने दाम पर बेचना पड़ता है.

केंद्र सरकार की डेटा के मुताबिक 16 जुलाई 2026 तक मध्य प्रदेश में 7,947.92 मीट्रिक टन मूंग की ही खरीदी की जा सकती है. यह खरीद सिर्फ 12 हजार किसानों से की गई है. खरीदी की यह मात्रा तय कोटे का सिर्फ 2 फीसदी ही है. ऐसे में किसानों के मन में ये शंका है, धीमी खरीदी के चलते उनकी फसल की गुणवत्ता खराब हो सकती है. ऐसे में उन्हें अपनी फसल की बिक्री के दौरान नुकसान उठाना पड़ सकता है.

किसान संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार ने अरहर, उड़द और मसूर जैसी दालों की 100 फीसदी एमएसपी खरीद का फैसला किया है. लेकिन मूंग को अभी भी प्राइस सपोर्ट स्कीम के दायरे में रखा गया है. यहां खरीद की सीमा तय की गई है. ऐसे में जब दूसरी दालों की पूरी खरीद एमएसपी पर हो सकती है.तो मूंग के साथ अलग नियम क्यों लागू किए जा रहे हैं?

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) से जुड़े 19 किसान संगठनों का कहना है कि वे पिछले करीब 20 दिनों से सरकार को ज्ञापन दे रहे थे. लेकिन सरकार ने उनकी मांगों पर गौर नहीं किया. फिर किसानों ने नर्मदापुरम के सेठानी घाट से भोपाल तक मार्च निकालने का फैसला किया. किसान अपने साथ बिस्तर, राशन, गैस सिलेंडर और खाना बनाने के बर्तन लेकर निकले हैं. उनका साफ कहना है कि अगर आंदोलन लंबा चलता है तो भी वे राजधानी में डटे रहेंगे.

कौन-कौन सी वजहों ने किसानों को भोपाल कूच करने के लिए मजबूर किया?
  • किसानों का आरोप है कि मूंग खरीदी को लेकर बड़ी संख्या में किसाननों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया है. बिना रजिस्ट्रेशन के वे सरकारी खरीद केंद्र पर अपनी फसल नहीं बेच सकते हैं. ऐसे में उन्हें अपनी फसल व्यापारियों को कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है.
  • किसानों का कहना है कि कई जिलों में खरीद केंद्रों की संख्या की जरूरत बेहद कम है. ऐसे में निर्धारित खरीदी केंद्रों तक पहुंचने के लिए उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो परिवहन के लागत को बढ़ा देती है. कम खरीद केंद्र होने से इन सेंटर्स पर भीड़ भी ज्यादा हो रही है, जो खरीद प्रक्रिया में देरी ला सकती है.
  • सरकारी खरीद में फेयर एवरेज क्वालिटी के मानकों का पालन जरूरी होता है. अगर मूंग की फसल में नमी अधिक हो या दाने का रंग, आकार या गुणवत्ता तय मानकों के अनुरूप न हो तो खरीद से इनकार किया जा सकता है. किसानों का कहना है कई बार मामूली कारणों से भी फसल रिजेक्ट कर दी जाती है.
  • पिछले वर्षों में कई किसानों ने शिकायत की थी कि खरीद के बाद भुगतान समय पर नहीं मिलता है. इस वजह से किसान चाहते हैं कि भुगतान की समयसीमा तय हो और उसका सख्ती से पालन किया जाए.
  • किसानों की मांग है कि सभी कृषकों का पंजीयन हो. पर्याप्त खरीद केंद्र बनाए जाएं. गुणवत्ता जांच में पारदर्शिता हो. समय पर भुगतान मिले. किसी भी पात्र किसान की फसल खरीद से बाहर न रहे.
सरकार का पक्ष क्या है?

किसानों के आरोप और मांग पर राज्य सरकार का कहना है कि अबकी बार मूंग खरीद की प्रक्रिया को बहुत अधिक पारदर्शी बनाया गया है. ऑनलाइन पंजीयन, स्लॉट बुकिंग और डिजिटल भुगतान जैसी सुविधाएं दी गई हैं. पात्र किसानों की उपज MSP पर खरीदी जाएगी और भुगतान सीधे बैंक खाते में किया जाएगा. हालांकि, किसान खरीद प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और अन्य कारणों को देखते हुए अपने नुकसान को लेकर आशंकित नजर आ रहे हैं.

100 प्रतिशत मूंग की फसल के लिए एमएसपी पर क्यों अड़े हैं किसान?

दरअसल, जब बाजार में मूंग का भाव किसानों की लागत के मुताबिक नहीं मिलता है तो सरकारी खरीद उनके लिए रक्षा कवच के तौर पर काम करती है. ऐसे में समय पर खरीद ना हो तो किसानों को कम दाम पर मजबूरी में व्यापारियों को कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है. इससे दो चीजें होंगी, एक तो मूंग खरीद प्रभावित हो सकती है. साथ ही किसानों को आर्थिक नुकसान हो सकता है. यही वजह है कि विशेषज्ञ समय रहते किसानों की इस समस्या का समाधान करने की सलाह सरकार को दे रहे हैं.

© Copyright @2026 LIDEA. All Rights Reserved.