Premanand Maharaj: आखिर क्यों रचा गया यह संसार? प्रेमानंद महाराज ने बताया ईश्वर की सृष्टि रचने का असली उद्देश्य
TV9 Bharatvarsh January 02, 2026 12:43 AM

दुनिया भर में अपने आध्यात्मिक विचारों से लाखों लोगों का मार्गदर्शन करने वाले संत प्रेमानंद महाराज से अक्सर भक्त जीवन और दर्शन से जुड़े गहरे सवाल पूछते हैं. हाल ही में एक भक्त ने महाराज जी से वह प्रश्न पूछा जो सदियों से मानवता को हैरत में डाले हुए है कि आखिर भगवान को इस संसार को रचने की जरूरत क्यों पड़ी? प्रेमानंद महाराज ने इस जटिल सवाल का जवाब बहुत ही सरल लेकिन आध्यात्मिक गहराई के साथ दिया. उन्होंने बताया कि यह संसार किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि ईश्वर की एक सहज लीला का परिणाम है.

एकोहं बहुस्याम

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, इस सृष्टि की रचना के पीछे भगवान की खेलने की इच्छा निहित है. उन्होंने शास्त्रोक्त वाक्यएकोहं बहुस्याम (मैं एक हूं, बहुत हो जाऊं) का उल्लेख करते हुए कहा कि जब परमात्मा को अकेलेपन के बजाय खेलने का भाव आया, तो उन्होंने स्वयं को ही जड़ और चैतन्य के रूप में विस्तार दे दिया.

उन्होंने समझाया कि खेल कभी अकेले नहीं होता. इसलिए, भगवान ने खुद को ही अनेक रूपों में विभाजित कर लिया. वे खुद ही खिलाड़ी हैं, खुद ही खिलौना हैं और खुद ही इस खेल के दर्शक भी हैं. वे अपने आप से ही खेलते हैं, स्वयं का पालन करते हैं और अंत में सब कुछ अपने आप में ही समेट लेते हैं.

भगवान की लीला

संसार के निर्माण और विनाश को समझाते हुए प्रेमानंद महाराज ने एक बहुत ही सुंदर उदाहरण दिया. उन्होंने कहा जैसे छोटे बच्चे खेल-खेल में मिट्टी के घरौंदे बनाते हैं और फिर उन्हें खुद ही बिगाड़ देते हैं, वैसे ही भगवान की यह लीला भी एक सहज बालवत चेष्टा है. इस पर तर्क या प्रश्न नहीं किया जा सकता क्योंकि यह उनकी मौज है.

माया और ईश्वर का संकल्प

अक्सर लोग पूछते हैं कि क्या ईश्वर को भी हमारी तरह इच्छाएं होती हैं? इस पर प्रेमानंद महाराज ने साफ किया कि भगवान की अपनी कोई व्यक्तिगत या स्वार्थी इच्छा नहीं होती. जब सृष्टि का समय आता है, तो उनके हृदय में ‘योग निद्रा’ के रूप में स्थित ‘प्रकृति’ या ‘माया’ ही इच्छा प्रकट करती है. यही माया उन्हें जागृत करती है और सृष्टि चक्र का आरंभ होता है.

बुद्धि की सीमा और समर्पण का मार्ग

प्रेमानंद महाराज ने चेताया कि मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से उस अनंत परमात्मा को पूरी तरह नहीं समझ सकता. उन्होंने कहा कि बुद्धि खुद प्रकृति का एक छोटा सा अंश है, भला वह अपने रचयिता को पूरी तरह कैसे नाप सकती है. जब इंसान बुद्धि लगाते-लगाते थक जाता है, तब उसे समझ आता है कि तर्क नहीं, बल्कि समर्पण ही ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग है. जब हम निरंतर परमात्मा का स्मरण करते हैं, तो वे स्वयं हमारी बुद्धि में आकर बैठ जाते हैं. इसी परमात्म बुद्धि से उन्हें जाना जा सकता है.

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