रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद से वैश्विक बाजार में मची उथल-पुथल के बीच भारत ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया, बल्कि महंगाई को भी काबू में रखा. इसका सबसे बड़ा श्रेय रूस से मिल रहे रियायती कच्चे तेल को जाता है. लेकिन अब समीकरण बदल चुके हैं. अमेरिका के साथ हुए हालिया व्यापार समझौते और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के चलते भारत को रूस के अलावा अन्य विकल्पों की ओर देखना पड़ रहा है. आम आदमी के मन में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सस्ता रूसी तेल बंद हुआ, तो क्या पेट्रोल-डीजल के दाम फिर आसमान छुएंगे? आइए विस्तार समझते हैं कि भारत के पास अब क्या रास्ते हैं और इसका आपकी जेब पर क्या असर पड़ने वाला है.
अमेरिका की शर्त और रूस से घटता आयातदरअसल, हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण ट्रेड डील के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर लगने वाले टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर सीधे 18 फीसदी कर दिया है. लेकिन इस राहत के बदले एक बड़ी शर्त रखी गई है भारत को रूस से कच्चे तेल का आयात बंद करना होगा. ट्रंप पिछले कई महीनों से लगातर भारत से रूस से तेल लेने बंद करने की बात करते रहे हैं. जिसका असर आंकड़ों में दिखना भी शुरू हो गया था.
दिसंबर 2025 तक जहां भारत रूस से औसतन 2.1 से 2.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल खरीद रहा था, वहीं जनवरी 2026 में यह आंकड़ा गिरकर 1 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर आ गया. फरवरी में इसमें भारी गिरावट देखने को मिल सकती है. हालांकि, भारतीय रिफाइनरी कंपनियां, जैसे कि नायरा एनर्जी, जिनके पास सीमित विकल्प हैं, वे अभी भी उन रास्तों से रूसी तेल खरीदने की कोशिश कर सकती हैं जिन पर प्रतिबंध लागू नहीं हैं. लेकिन तस्वीर साफ है कि भारत अब अपनी निर्भरता रूस से कम कर रहा है.
ये देश बनेंगे भारत के नए खेवनहाररूस से हटने का मतलब यह नहीं है कि भारत के पास विकल्पों की कमी है. विशेषज्ञों और रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, भारत के लिए वेनेजुएला एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है. वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है और वहां का कच्चा तेल ‘भारी’ (Heavy Crude) श्रेणी में आता है, जो आमतौर पर सस्ता होता है.
भारत के पास अत्याधुनिक रिफाइनिंग क्षमताएं हैं जो इस भारी कच्चे तेल को आसानी से प्रोसेस कर सकती हैं. वेनेजुएला के अलावा, ब्राजील भी एक उभरता हुआ आपूर्तिकर्ता है जिससे भारत ने हाल के दिनों में तेल खरीदना शुरू किया है. इसके साथ ही सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) तो भारत के पारंपरिक साथी रहे ही हैं.इसके साथ अमेरिका से भी तेल खरीदने का रास्ता खुला है, लेकिन अमेरिकी तेल, रूसी तेल की तुलना में महंगा साबित हो सकता है. इसलिए सरकार की कोशिश वेनेजुएला जैसे सस्ते विकल्पों पर ज्यादा रहेगी ताकि लागत को नियंत्रित किया जा सके.
इन देशों में तेल निकालने की लागत सबसे कम हैउत्पादन लागत का मतलब होता है , ज़मीन के अंदर से एक बैरल कच्चा तेल निकालने में कितना खर्च आता है. दुनिया में कुछ ऐसे देश हैं जहां ये खर्च बहुत कम पड़ता है:
आम जनता के लिए सबसे चिंताजनक बात पेट्रोल और डीजल की कीमतें हैं. रूस से मिल रहे सस्ते तेल ने पिछले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था को महंगाई की मार से बचाया है. अगर रूसी तेल की सप्लाई पूरी तरह बंद होती है और भारत को बाजार भाव पर महंगा तेल खरीदना पड़ता है, तो अनुमान है कि भारत के आयात बिल में सालाना 9 से 12 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है.
यानी, अगर लागत बढ़ी तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 5 से 6 रुपये प्रति लीटर तक का इजाफा हो सकता है. लेकिन यहां एक राहत की उम्मीद भी है. सरकार के पास ‘एक्साइज ड्यूटी’ (उत्पाद शुल्क) में कटौती करने का एक मजबूत हथियार है. यदि वैश्विक कीमतों के कारण तेल महंगा होता है, तो सरकार टैक्स घटाकर उस बोझ को खुद वहन कर सकती है, जिससे आम उपभोक्ता पर सीधा असर न पड़े.
मार्च तक आती रहेगी सप्लाईभले ही अमेरिका के साथ डील हो गई हो, लेकिन तेल का खेल रातों-रात नहीं बदलता. रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने रूस के साथ जनवरी और फरवरी में ही कई सौदे पक्के कर लिए थे. इन सौदों के तहत तेल की डिलीवरी मार्च तक जारी रहेगी.
भारत के लिए स्थिति अभी “एक हाथ में लड्डू, दूसरे में भी लड्डू” जैसी है. एक तरफ पुराने सौदों के तहत सस्ता रूसी तेल आ रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और वेनेजुएला के रास्ते खुल रहे हैं. वहीं अगर वेनेजुएला से सस्ता तेल समय पर मिलना शुरू हो जाता है और सरकार टैक्स में थोड़ी राहत देती है, तो पेट्रोल पंप पर आपको बढ़ी हुई कीमतों का झटका नहीं लगेगा.