अगले वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही करदाताओं के लिए कई चीजें बदलने वाली हैं. हाल ही में सरकार ने ‘इनकम टैक्स रूल्स 2026’ का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. सरकार ने टैक्स स्लैब या दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. इस बार पूरा फोकस पारदर्शिता बढ़ाने, डिजिटल रिपोर्टिंग को मजबूत करने और टैक्स चोरी रोकने पर है. लेकिन इन सबके बीच, भत्तों और नियमों में कुछ ऐसे बदलाव किए गए हैं जो आम सैलरीड क्लास के टेक-होम वेतन को प्रभावित करेंगे. आइए समझते हैं कि 1 अप्रैल 2026 से लागू हो रहे इस नए टैक्स सिस्टम का आपकी जिंदगी पर क्या असर होगा.
इलेक्ट्रिक कार (EV) इस्तेमाल करने वालों की हुई चांदीअगर आप ऑफिस आने-जाने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ी (EV) का इस्तेमाल करते हैं, तो नए नियम आपके लिए एक बड़ी राहत लेकर आए हैं. सरकार ने पहली बार इलेक्ट्रिक वाहनों को ‘कंसेशनल परक्विजिट वैल्यूएशन रूल्स’ के दायरे में शामिल कर लिया है. इसका सीधा मतलब यह है कि अब कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले ईवी भत्तों पर टैक्स छूट की स्थिति साफ हो गई है. अगर आपकी गाड़ी का खर्च आपकी कंपनी उठा रही है, तो आपको हर महीने ₹5,000 (साथ में ₹3,000 ड्राइवर के लिए) का फायदा मिलेगा. वहीं, अगर आप निजी खर्च पर ईवी का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो यह फायदा ₹2,000 प्रति माह (प्लस ₹3,000 ड्राइवर के लिए) होगा. पहले टैक्स छूट गाड़ी के इंजन की क्षमता (CC) के आधार पर तय होती थी, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियों के मामले में बेमानी थी.
कुछ शहरों में जश्न, तो NCR वालों को निराशाकिराए के मकान में रहने वाले नौकरीपेशा लोगों के लिए हाउस रेंट अलाउंस (HRA) टैक्स बचाने का एक बड़ा हथियार होता है. नए नियमों में सरकार ने 50% HRA छूट वाले शहरों की सूची को बढ़ा दिया है. अब बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद जैसे तेजी से बढ़ते आईटी और बिजनेस हब में काम करने वाले कर्मचारियों को भी 50% HRA क्लेम करने की सुविधा मिलेगी. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगर इस लिस्ट में पहले से ही शामिल हैं.
हालांकि, दिल्ली-एनसीआर में काम करने वालों के लिए यह खबर थोड़ी मायूसी भरी है. नोएडा, गुरुग्राम और नवी मुंबई जैसे प्रमुख रोजगार केंद्रों को अभी भी 40% HRA की श्रेणी में ही रखा गया है. यह उन कर्मचारियों के लिए एक बड़ा झटका है जो इन शहरों में रहते हैं, क्योंकि यहां रहने का खर्च महानगरों से कम नहीं है, लेकिन टैक्स में मिलने वाली छूट उनके मुकाबले काफी कम रह गई है.
क्रिप्टो और डिजिटल लेन-देन पर सरकार की पैनी नजरआम नौकरीपेशा लोगों के अलावा, सरकार ने तकनीक के जरिए पूरे टैक्स सिस्टम को कसने की तैयारी कर ली है. अंतरराष्ट्रीय संस्था OECD के मानकों को अपनाते हुए, अब भारत में भी डिजिटल संपत्तियों की निगरानी सख्त होगी. अगर आप क्रिप्टो-एसेट्स, सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDCs) या किसी अन्य ई-मनी में निवेश करते हैं, तो अब इनकी पूरी जानकारी टैक्स विभाग को देनी होगी. इससे देश-विदेश में होने वाले डिजिटल ट्रांजैक्शन ज्यादा पारदर्शी होंगे और वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी बढ़ेगी. बिजनेसेज और हाई-इनकम वाले टैक्सपेयर्स को अब अपना डॉक्यूमेंटेशन और भी मजबूत रखना होगा.
कॉरपोरेट्स और ट्रस्ट के लिए भी बदले नियमकारोबारियों और कॉरपोरेट जगत के लिए भी नियम बदले हैं. डेटा सेंटर सेवाओं का दायरा बढ़ाया गया है और मुकदमेबाजी को कम करने के लिए समय-सीमाओं को सख्त किया गया है. इसके अलावा, चैरिटेबल ट्रस्ट चलाने वालों के लिए प्रक्रिया को आसान बनाते हुए रजिस्ट्रेशन का केवल एक फॉर्म कर दिया गया है. साथ ही, अब उन्हें अपने रिकॉर्ड 10 साल के बजाय सिर्फ 6 साल तक ही सुरक्षित रखने होंगे.