पाकिस्तान के इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई है. इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है और कच्चे तेल की कीमतों में अचानक जोरदार उछाल देखने को मिला है. इस कूटनीतिक विफलता के बीच अमेरिका ने ‘होरमुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी का भी ऐलान कर दिया है, जिससे पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराने का खतरा पैदा हो गया है. यह सिर्फ दो देशों की आपसी खींचतान नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर उस तेल-गैस की सप्लाई लाइन पर पड़ता है, जिससे दुनिया की अर्थव्यवस्था चलती है.
शांति की उम्मीद टूटी, तेल बाजार में मची खलबलीइस्लामाबाद में चल रही कूटनीतिक बातचीत से शेयर और कमोडिटी बाजार को काफी उम्मीदें थीं. लेकिन जैसे ही यह खबर आई कि दोनों देश किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके हैं, बाजार में घबराहट फैल गई. इसका सबसे पहला और तेज असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखा. ग्लोबल बेंचमार्क माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड ऑयल में 8.36 फीसदी की भारी उछाल आई और यह 103.16 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया. इसी तरह, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 8.22 फीसदी की तेजी के साथ 104.57 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया. बात सिर्फ तेल तक ही सीमित नहीं रही, स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यूरोपीय गैस वायदा कीमतों में भी एक समय लगभग 18 फीसदी का जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया. ऊर्जा की यह बढ़ती लागत वैश्विक स्तर पर महंगाई को नई हवा दे सकती है.
होरमुज की नाकाबंदी, क्या थम जाएगी सप्लाई चेन?इस पूरे तनाव के केंद्र में होरमुज जलडमरूमध्य है. यह फारस की खाड़ी को वैश्विक बाजारों से जोड़ने वाला एक बेहद अहम ‘चोकपॉइंट’ (तंग जलमार्ग) है, जहां से दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है. यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने सोमवार को न्यूयॉर्क समयानुसार सुबह 10 बजे से इस इलाके में नाकाबंदी लागू कर दी है. हालांकि, अमेरिकी सेना ने यह साफ किया है कि यह पाबंदी विशेष रूप से केवल उन जहाजों पर लागू होगी जो ईरानी बंदरगाहों पर आ रहे हैं या वहां से जा रहे हैं. अमेरिका का दावा है कि वह सभी देशों के जहाजों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करेगा और जो जहाज गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच व्यापार कर रहे हैं, उन्हें इस जलमार्ग से गुजरने दिया जाएगा. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि फरवरी के अंत में ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से ही यह महत्वपूर्ण कमर्शियल रूट प्रभावी रूप से बंद पड़ा है.
परमाणु हथियार पर बिगड़ी बातकूटनीतिक मोर्चे पर दोनों पक्ष अब खुलकर एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर निराशा जताते हुए कहा कि ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए पूरी ईमानदारी के साथ बातचीत की थी. उनका कहना है कि दोनों देश ‘इस्लामाबाद एमओयू’ (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर करने के बेहद करीब थे, लेकिन ऐन मौके पर अमेरिका ने नई शर्तें रख दीं और नाकाबंदी का रास्ता चुन लिया.
दूसरी तरफ, बिना कोई डील किए स्वदेश लौटे अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन का मुख्य लक्ष्य ईरान से यह लिखित प्रतिबद्धता हासिल करना था कि वह किसी भी सूरत में परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा, जो कि पूरा नहीं हो सका. हालात और भी तनावपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने चेतावनी दी है कि यह जलडमरूमध्य पूरी तरह से उनके नियंत्रण में है. उन्होंने साफ कहा है कि गैर-सैन्य जहाजों के लिए रास्ता खुला है, लेकिन किसी भी सैन्य जहाज की आवाजाही का ‘करारा जवाब’ दिया जाएगा. फिलहाल 22 अप्रैल को सीजफायर की डेडलाइन खत्म हो रही है और इसके बाद हालात क्या रुख लेंगे, यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है.
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