मां सिर्फ परिवार की जिम्मेदारी नहीं संभालती, बल्कि जरूरत पड़ने पर घर और नौकरी दोनों के बीच ऐसा संतुलन बनाती है, जो हर किसी के लिए प्रेरणा बन जाता है. कल, 10 मई को मदर्स डे है. ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो एक मिशाल पेश करती है. महिला एवं बाल विकास विभाग में काम करने वाली कई महिलाएं अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर दफ्तर और फील्ड की जिम्मेदारियां निभा रही हैं. कोई 6 महीने के बच्चे को गोद में लेकर ऑफिस पहुंचती है, तो कोई 11 महीने के बच्चे के साथ गांव-गांव फील्ड विजिट करती नजर आती हैं.
महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत निखत बानो बताती हैं कि शादी के बाद जब उनका बच्चा केवल 6 महीने का था, तब से उन्होंने बच्चे को साथ लेकर ही ऑफिस आना शुरू कर दिया था. उनका कहना है कि मां होने के साथ सरकारी जिम्मेदारी निभाना आसान नहीं होता. कई बार बच्चा बीमार होता है, लेकिन जरूरी काम के कारण छुट्टी लेना संभव नहीं हो पाता. ऐसे समय में बच्चे को साथ लेकर ही ऑफिस या फील्ड जाना पड़ता है. निखत कहती हैं कि दफ्तर के सहयोगियों का साथ उन्हें हर मुश्किल में हिम्मत देता है.
11 महीने के बच्चे को लेकर फील्ड में जाती हैं स्वेताविभाग की परिवेक्षक स्वेता भी अपने 11 महीने के बच्चे को साथ लेकर फील्ड में जाती हैं. तेज धूप, बारिश और ठंड के बीच भी वह अपने काम से पीछे नहीं हटतीं. उनका कहना है कि एक मां अपने छोटे बच्चे को लेकर हमेशा चिंतित रहती है. इसलिए वह बच्चे को अपने साथ रखना ज्यादा सुरक्षित और सुकूनभरा मानती है. कई बार ज्यादा काम होने पर साथी कर्मचारी भी बच्चे को संभालने में मदद करते हैं.
महिला एवं बाल विकास विभाग की वरिष्ठ अधिकारी मेहजबीन बताती हैं कि विभाग महिलाओं और बच्चों से जुड़ा होने के कारण यहां काम करने वाली माताओं की जरूरतों को विशेष महत्व दिया जाता है. गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद महिलाओं को अवकाश की सुविधा दी जाती है.
साथ ही छोटे बच्चों की देखभाल और कार्यस्थल पर सहयोग जैसी व्यवस्थाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं. मदर्स डे के मौके पर ये महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि मां सिर्फ घर की ताकत नहीं होती, बल्कि समाज और व्यवस्था को संभालने वाली सबसे मजबूत कड़ी भी होती है.