कहते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी अदालत और सबसे बड़ी पाठशाला ‘मां’ की गोद होती है। आज मदर्स डे के मौके पर हम आपको बिहार की उन दो महान माताओं की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिन्होंने अभाव और मुफलिसी के अंधेरे में रहकर भी अपने बेटों के लिए कामयाबी का सूरज उगाया। यह कहानी है ‘सुपर 30’ फेम आनंद कुमार और ‘1 रुपया गुरु दक्षिणा’ वाले मैथमेटिक्स गुरु आरके श्रीवास्तव की। इन दोनों ने आज जो मुकाम हासिल किया है और राष्ट्रपति भवन तक का जो सफर तय किया है, उसके पीछे उनकी माताओं का वो संघर्ष है जो शायद ही किसी कागज़ पर पूरी तरह उतारा जा सके।
दरअसल, बिहार के इन दो शिक्षकों की कार्यशैली की सराहना खुद देश की राष्ट्रपति भी कर चुकी हैं। लेकिन आनंद कुमार और आरके श्रीवास्तव अपनी हर सफलता का श्रेय खुद को नहीं, बल्कि अपनी मां के आशीर्वाद और उनके कड़े परिश्रम को देते हैं। इन दोनों के जीवन की कहानी साबित करती है कि अगर मां का साथ हो, तो कीचड़ में खिला कमल भी अपनी खुशबू पूरी दुनिया में फैला सकता है।
जयंती देवी: जब आनंद कुमार के ‘सुपर 30’ के लिए मां ने खुद संभाली रसोई
पूरी दुनिया आज आनंद कुमार को ‘सुपर 30’ के संस्थापक के रूप में जानती है, जिन पर बॉलीवुड फिल्म भी बन चुकी है। लेकिन आनंद कुमार अक्सर भावुक होकर बताते हैं कि उनकी मां जयंती देवी ही वास्तव में ‘सुपर 30’ की असली नींव हैं। आनंद के पिता के गुजर जाने के बाद परिवार पर आर्थिक दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। घर चलाने के लिए मां पापड़ बेलती थीं और आनंद उन्हें साइकिल पर बेचने जाते थे।
जब आनंद कुमार ने समाज के सबसे पिछड़े और गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाकर आईआईटी (IIT) भेजने का संकल्प लिया, तो सबसे बड़ी चुनौती थी उन बच्चों के रहने और खाने की। उस वक्त उनकी मां जयंती देवी ने बिना किसी हिचकिचाहट के खुद रसोई की कमान संभाल ली। उन्होंने सालों तक उन बच्चों के लिए अपने हाथों से खाना बनाया, ताकि आनंद निश्चिंत होकर बच्चों को पढ़ा सकें और बच्चे खाली पेट न रहें। असल में, उन बच्चों के लिए वह केवल एक रसोइया नहीं बल्कि एक मां थीं, जिनके हाथ के खाने ने सैकड़ों इंजीनियरों का भविष्य तैयार किया।
आरके श्रीवास्तव: ऑटो रिक्शा से लेकर राष्ट्रपति भवन तक का सफर
दूसरी ओर, बिहार के ही रोहतास जिले के रहने वाले आरके श्रीवास्तव की कहानी भी उतनी ही प्रेरणादायक है। उन्हें आज दुनिया ‘मैथमेटिक्स गुरु’ के नाम से जानती है, जो महज 1 रुपये की गुरु दक्षिणा में बच्चों को पढ़ाते हैं। आरके श्रीवास्तव जब सिर्फ 5 साल के थे, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। मुफलिसी का आलम यह था कि घर का खर्च चलाने के लिए ऑटो रिक्शा तक का सहारा लेना पड़ा।
उनकी मां आरती देवी ने जिस तरह विपरीत परिस्थितियों में अपने परिवार को बिखरने से बचाया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। आरके श्रीवास्तव बताते हैं कि उनकी मां के त्याग ने ही उन्हें आज इस काबिल बनाया है। वह अक्सर कहते हैं, “मां-बाप से बढ़कर जग में कोई दूजा खजाना नहीं है।” आरके श्रीवास्तव की मेहनत का ही नतीजा है कि आज उनके पढ़ाए हुए 950 से अधिक छात्र आईआईटी और एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पहुंच चुके हैं। वे युवा पीढ़ी को अक्सर यह संदेश देते हैं कि माता-पिता का सम्मान ही सफलता की पहली सीढ़ी है।
अभावों को मात देकर बने लाखों युवाओं के रोल मॉडल
इन दोनों गुरुओं का मानना है कि मां केवल जन्म ही नहीं देती, बल्कि वह पहली गुरु भी होती है जो कठिन परिस्थितियों से लड़ना सिखाती है। आनंद कुमार और आरके श्रीवास्तव, दोनों ने ही साबित कर दिया कि जीतने वाले कभी हार नहीं मानते और छोड़ने वाले कभी जीत नहीं सकते। आज ये दोनों शिक्षक लाखों युवाओं के रोल मॉडल बन चुके हैं।
आज जब हम मदर्स डे मना रहे हैं, तो इन दो माताओं—जयंती देवी और आरती देवी—की कहानी हमें याद दिलाती है कि एक साधारण सी दिखने वाली मां के भीतर कितनी असाधारण शक्ति छिपी होती है। उनके संघर्षों ने न केवल दो बेटों को सफल बनाया, बल्कि देश को सैकड़ों ऐसे इंजीनियर और नागरिक दिए जो आज भारत का नाम रोशन कर रहे हैं। असल में, यह उन माताओं की जीत है जिन्होंने कभी हारना नहीं सीखा।