आत्मनिर्भर भारत का अगला कदम : भारतीय कंपनियों के बीच मजबूत साझेदारी क्यों जरूरी है?
रजत वर्मा
पिछले दस वर्षों में भारत ने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं से लेकर सड़कों, बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में बड़े निवेश तक, सरकार ने उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए व्यापक प्रयास किए हैं। इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम भी सामने आया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 2014-15 की तुलना में 2024-25 तक देश का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लगभग छह गुना बढ़कर 11.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात भी लगभग आठ गुना बढ़कर 3.27 लाख करोड़ रुपये हो गया। मोबाइल फोन निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और बैटरी निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि इन उपलब्धियों के बावजूद एक महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ है कि क्या केवल उत्पादन बढ़ा लेना ही पर्याप्त है?
उत्पादन बढ़ा, लेकिन वैल्यू एडिशन अभी भी सीमित
भारत में बनने वाले कई उत्पादों के महत्वपूर्ण पुर्जे, कंपोनेंट और कच्चा माल अब भी विदेशों से आयात किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि अंतिम उत्पाद भले ही भारत में तैयार हो रहा हो, लेकिन उससे जुड़ा बड़ा आर्थिक लाभ दूसरे देशों को मिल रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र में घरेलू वैल्यू एडिशन अभी भी लगभग 18 से 20 प्रतिशत के बीच है। यानी किसी उत्पाद का केवल एक छोटा हिस्सा ही वास्तव में भारत में निर्मित या विकसित होता है, जबकि बाकी मूल्य विदेशों में बने कंपोनेंट्स और तकनीक से जुड़ा होता है।
यदि भारत को वैश्विक विनिर्माण शक्ति बनना है, तो केवल असेंबली आधारित मॉडल से आगे बढ़ना होगा। देश को ऐसे उद्योग विकसित करने होंगे जो पूरी सप्लाई चेन में योगदान दें।
Make in India नहीं, Build with India की जरूरतआत्मनिर्भर भारत का अगला चरण केवल "मेक इन इंडिया" तक सीमित नहीं रह सकता। अब समय "बिल्ड विथ इंडिया" का है। इसका अर्थ है कि भारतीय कंपनियां एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करें, तकनीक विकसित करें, कच्चे माल से लेकर अंतिम उत्पाद तक मजबूत घरेलू सप्लाई चेन तैयार करें और वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हों। जब देश के भीतर ही विभिन्न उद्योग एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तब उत्पादन की लागत कम होती है, रोजगार बढ़ते हैं और नवाचार को भी बढ़ावा मिलता है।
भारत का इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। सरकार की विभिन्न योजनाओं और बढ़ती मांग के कारण इस क्षेत्र में निवेश लगातार बढ़ रहा है। लेकिन आज भी बैटरी सेल, महत्वपूर्ण खनिज और कई उन्नत तकनीकों के लिए भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर है। इसका परिणाम यह होता है कि उद्योग का बड़ा आर्थिक लाभ विदेशों में चला जाता है।
यदि भारतीय कंपनियां बैटरी निर्माण, रिसाइक्लिंग, ऊर्जा भंडारण और संबंधित तकनीकों में आपसी सहयोग बढ़ाएं, तो देश के भीतर ही एक मजबूत औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित किया जा सकता है। इससे रोजगार और निवेश दोनों में वृद्धि होगी।
सफल अर्थव्यवस्थाओं से क्या सीख सकते हैं?दुनिया के कई विकसित देशों ने केवल बड़े कारखानों के सहारे औद्योगिक सफलता हासिल नहीं की। उनकी सफलता के पीछे मजबूत घरेलू सप्लाई चेन और औद्योगिक साझेदारी का बड़ा योगदान रहा है। जापान ने दशकों तक अपने सप्लायर नेटवर्क को मजबूत किया। वहां बड़ी कंपनियां छोटे और मध्यम उद्योगों के साथ दीर्घकालिक साझेदारी करती हैं। इससे गुणवत्ता और नवाचार दोनों को बढ़ावा मिला।
दक्षिण कोरिया में सैमसंग और हुंडई जैसी बड़ी कंपनियों ने हजारों स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ मिलकर विकास किया। परिणामस्वरूप पूरे देश में औद्योगिक विकास का लाभ पहुंचा। जर्मनी का प्रसिद्ध "मिटलस्टैंड" मॉडल छोटे और मध्यम उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का आधार बनाता है। ये कंपनियां विशिष्ट तकनीकों और उत्पादों में विशेषज्ञता विकसित करती हैं और बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर काम करती हैं।
इन सभी उदाहरणों में एक समान बात दिखाई देती है- मजबूत घरेलू औद्योगिक साझेदारी।
भारत के लिए यह मॉडल क्यों महत्वपूर्ण है?आज वैश्विक सप्लाई चेन कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रही हैं। महामारी, युद्ध, व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक संघर्षों ने यह दिखा दिया है कि किसी भी देश के लिए अत्यधिक आयात निर्भरता जोखिमपूर्ण हो सकती है। यदि भारत के भीतर मजबूत औद्योगिक नेटवर्क विकसित होते हैं, तो देश बाहरी झटकों से बेहतर तरीके से निपट सकता है।
इसके अलावा घरेलू कंपनियों के बीच सहयोग से कई अन्य लाभ भी मिलते हैं। पहला, देश में अधिक रोजगार पैदा होते हैं। दूसरा, तकनीकी क्षमता का विकास होता है। तीसरा, निवेश देश के भीतर बना रहता है। चौथा, भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक मजबूत बन सकता है।
2047 के लक्ष्य को हासिल करने की चुनौती
भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य में विनिर्माण क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। लेकिन केवल बड़े निवेश या नई फैक्ट्रियां लगाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि सप्लाई चेन के विभिन्न स्तरों पर भारतीय कंपनियां एक-दूसरे से जुड़ी नहीं होंगी, तो वास्तविक आर्थिक लाभ सीमित रह जाएगा। इसलिए जरूरी है कि उद्योगों के बीच सहयोग को राष्ट्रीय विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाए।
नीति निर्माण में क्या बदलाव जरूरी हैं?
अब समय आ गया है कि नीतियां केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक सीमित न रहें। उन्हें घरेलू औद्योगिक सहयोग को भी बढ़ावा देना चाहिए। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।
स्थानीय सोर्सिंग को बढ़ावा दिया जाए।
MSME इकाइयों को बड़ी कंपनियों की सप्लाई चेन से जोड़ा जाए।
गुणवत्ता मानकों को वैश्विक स्तर का बनाया जाए।
परीक्षण और प्रमाणन सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
अनुसंधान एवं विकास (R&D) को अधिक समर्थन दिया जाए।इन कदमों से भारतीय कंपनियां वैश्विक सप्लाई चेन में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेंगी। सरकारी खरीद मंच GeM और रक्षा क्षेत्र की स्थानीयकरण नीतियों ने दिखाया है कि सही नीति समर्थन मिलने पर घरेलू उद्योग तेजी से विकसित हो सकते हैं। इन पहलों ने हजारों भारतीय कंपनियों को नए अवसर प्रदान किए हैं। इसी प्रकार के मॉडल अन्य क्षेत्रों में भी लागू किए जा सकते हैं ताकि घरेलू उद्योगों को अधिक अवसर मिल सकें।
आगे की राह
भारत आज अपने औद्योगिक विकास के एक निर्णायक चरण में है। देश के पास विशाल बाजार, युवा कार्यबल और तेजी से विकसित हो रहा तकनीकी इकोसिस्टम मौजूद है। लेकिन यदि भारत को वास्तव में वैश्विक विनिर्माण शक्ति बनना है, तो केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। बड़ी कंपनियों, MSMEs और स्टार्टअप्स को एक साथ जोड़ने वाला मजबूत औद्योगिक नेटवर्क तैयार करना होगा।
जब भारतीय कंपनियां मिलकर काम करेंगी, तकनीक साझा करेंगी और देश के भीतर अधिक मूल्य सृजित करेंगी, तभी आत्मनिर्भर भारत का सपना पूरी तरह साकार हो सकेगा। अंततः किसी देश की औद्योगिक सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह कितना उत्पादन करता है, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उसके उद्योग एक-दूसरे के साथ कितनी मजबूती से जुड़े हुए हैं। भारत के लिए अब यही अगला महत्वपूर्ण कदम है।
रजत वर्मा, लोहम के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। वे बैटरी रिसाइक्लिंग, ऊर्जा भंडारण और परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उनका फोकस भारत में घरेलू सप्लाई चेन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और औद्योगिक साझेदारी को मजबूत बनाने पर है।
अस्वीकरण : यह आलेख लेखक के निजी विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त मत किसी संस्था, कंपनी, प्रकाशन समूह या सरकारी एजेंसी के आधिकारिक विचार नहीं हैं। लेख में उल्लिखित आंकड़े सार्वजनिक स्रोतों और उद्योग अनुमानों पर आधारित हैं; अंतिम निवेश, व्यवसायिक या नीतिगत निर्णय लेने से पहले स्वतंत्र सत्यापन करना उचित होगा।