
New Delhi, 29 जून . महान स्वतंत्रता सेनानी और ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से जाने जाने वाले दादाभाई नैरोजी का निधन 30 जून 1917 को बंबई (Mumbai ) में हुआ था. वे देश के प्रसिद्ध राजनेता, उद्योगपति, शिक्षाविद और विचारक थे. देश की संपत्ति को अंग्रेजों की ओर से लूटकर ब्रिटेन ले जाने का खुलासा दादाभाई नैरोजी ने किया था.
4 सितंबर 1825 को एक पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नैरोजी भारतीय राजनीति में बौद्धिकता के स्तंभ माने जाते थे. उनकी शुरुआती पढ़ाई एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट स्कूल में हुई. उनको बड़ोदरा के महाराजा का संरक्षण मिला था और इस रियासत में उन्होंने दीवान के रूप में भी काम किया. दादाभाई नैरोजी ने एक प्रोफेसर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं. उनकी पहचान एक समाज सुधारक के तौर पर भी की जाती है.
उन्होंने वर्ष 1849 में लड़कियों के लिए स्कूल खोला था, तब उनको रूढ़ीवादी पुरुषों के विरोध का सामना करना पड़ा था. हालांकि उनमें अपनी बात को रखने की अद्भुत कला थी और वे हवा के रूख को मोड़ना जानते थे. पांच वर्ष के भीतर ही उनकी ओर से खोले गए स्कूल में छात्राओं की संख्या में कापी बढ़ोतरी हो गई थी. इसके बाद उन्होंने लैंगिग समानता की मांग उठाई थी.
वर्ष 1855 में दादाभाई नैरोजी ने जब पहली बार ब्रिटेन की यात्रा की तो वहां की समृद्धि देखकर स्तब्ध हो गए थे. उन्होंने समझने की कोशिश की कि उनका देश यानी भारत, इतना पिछड़ा क्यों है? तब उन्होंने दो दशक आर्थिक विश्लेषण की शुरुआत की थी. उनकी ब्रिटिश संसद में पहुंचने की महत्वाकांक्षा देश की गरीबी थी.
दादाभाई नैरोजी ब्रिटेन में भारतीयों की आवाज बने. बतौर राजनेता वह वर्ष 1892 से लेकर 1895 तक यूके हाउस ऑफ कॉमन्स में सांसद थे. वे भारतीयों की परेशानियों को ब्रिटिश Government और वहां की जनता तक पहुंचाते थे. दादाभाई नैरोजी ने ब्रिटेन में महिलाओं के अधिकार सहित कई मुद्दों को जोरों से उठाया था. India दादाभाई नैरोजी के योगदान को हमेशा याद करता है और देश उनका ऋणी है.
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एसडी/पीएम