नो कैश, ओनली केयर! 'वकील साहब अनाथालय में करिए सेवा…' हाईकोर्ट ने क्यों सुनाया ऐसा फैसला?
TV9 Bharatvarsh July 13, 2026 02:43 PM

Jabalpur High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अनोखा फैसला सुनाया है. अब जुर्माने की जगह वकील साहब को बांटना होगा प्यार… जी हां, जबलपुर हाईकोर्ट ने सामाजिक सरोकार की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है. जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की बेंच ने वकील की गैरमौजूदगी में खारिज हुई एक रिट अपील को दोबारा बहाल तो किया, लेकिन कोई भारी-भरकम जुर्माना नहीं लगाया. कोर्ट ने शर्त रखी कि अधिवक्ता उमरिया के एक अनाथालय जाएंगे, बच्चों के साथ वक्त बिताएंगे और उनके लिए खाने-पीने का सामान लेकर जाएंगे.

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की डिवीजन बेंच ने यह आदेश उमरिया जिले के नौरोजाबाद निवासी रमेश कुमार पटेल द्वारा साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के खिलाफ दायर रिट अपील की सुनवाई के दौरान दिया. यह अपील 1 अप्रैल 2026 को अधिवक्ता की अनुपस्थिति के कारण निरस्त कर दी गई थी. बाद में अपील को पुनः बहाल करने के लिए अदालत में आवेदन प्रस्तुत किया गया.

‘वकील की गलती का नुकसान मुवक्किल को नहीं होना चाहिए’

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनकी गैरहाजिरी जानबूझकर नहीं थी, बल्कि ऐसी परिस्थितियों के कारण हुई, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था. उन्होंने यह भी दलील दी कि वकील की गलती या अनुपस्थिति का नुकसान उसके मुवक्किल को नहीं उठाना चाहिए. अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए रिट अपील बहाल करने का निर्णय लिया, लेकिन इसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की शर्त भी जोड़ दी.

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि अधिवक्ता जबलपुर स्थित राजकुमारी बाई बाल निकेतन जाकर वहां रहने वाले बच्चों के साथ कम से कम एक घंटा बिताएं. इसके अलावा लगभग दो हजार रुपये मूल्य के फल, नाश्ता या अन्य खाद्य सामग्री बच्चों को उपलब्ध कराएं. अदालत ने यह भी कहा कि अधिवक्ता अपने अनुभव, निरीक्षण और सुझावों के साथ शपथपत्र सहित विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करें. रिपोर्ट जमा होने के बाद ही रिट अपील को उसके मूल क्रमांक पर बहाल कर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा.

समाज के जिम्मेदार वर्ग को भी निभानी चाहिए सामाजिक भूमिका: हाईकोर्ट

अपने आदेश में अदालत ने कहा कि इस प्रकार की सामुदायिक सेवा से अधिवक्ता को आत्मिक संतुष्टि मिलेगी और अनाथालय में रह रहे बच्चों को यह महसूस होगा कि समाज उनके साथ खड़ा है. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि डॉक्टर, अधिवक्ता, चार्टर्ड अकाउंटेंट और प्रशासनिक अधिकारियों जैसे जिम्मेदार वर्गों को समय-समय पर अनाथालय, वृद्धाश्रम और नारी निकेतन जैसी संस्थाओं का दौरा करना चाहिए. इससे वहां रहने वाले लोगों का मनोबल बढ़ेगा और संस्थानों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता व जवाबदेही भी मजबूत होगी.

सरकार को नीति बनाने की सलाह

अदालत ने महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक न्याय विभाग और पुलिस विभाग को भी ऐसी पहल को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी नीति बनाने पर विचार करने की सलाह दी है. साथ ही आदेश की प्रति मुख्य सचिव और संबंधित विभागों को भेजने के निर्देश दिए गए हैं.

यह पहली बार नहीं है जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सामाजिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देने वाला ऐसा आदेश दिया है. इससे पहले भी यही डिवीजन बेंच एक मामले में याचिकाकर्ता को मूक-बधिर विद्यालय जाकर बच्चों के साथ समय बिताने और उनके लिए नाश्ता उपलब्ध कराने का निर्देश दे चुकी है. अदालत का यह ताजा फैसला एक बार फिर यह संदेश देता है कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है.

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