ज्यादा पैसा या सुकून भरी जिंदगी? अगर आप दूसरा वाला ऑप्शन चुनते हैं तो 27 की उम्र में भी आपको लगेगा कि लाइफ अभी शुरू हुई है. ये बात किसी ऐसे-वैसे इंसान ने नहीं, बल्कि IIT कानपुर से पढ़े अर्जव मोदी ने कही है. अर्जव ने बेंगलुरु की हाई-फाई कॉर्पोरेट लाइफ और पहाड़ों की स्लो लाइफ की तुलना करके एक बहुत गहरी बात समझाई है. अर्जव खुद आज राइटिंग फील्ड में काम करते हैं और पिछले 4 महीनों से पहाड़ों में शिफ्ट हो गए हैं. उनका कहना है कि कम सैलरी और कम सुविधाओं के बावजूद पहाड़ों वाली जिंदगी बेंगलुरु की 40 लाख वाली जॉब से कहीं ज्यादा बेहतर है.
अर्जव अपनी कहानी की शुरुआत बेंगलुरु से करते हैं. इमेजिन करो, आप बेंगलुरु में हो. साल का 40 लाख का पैकेज है. हाथ में सब कुछ है जो एक सक्सेसफुल करियर के लिए चाहिए. आने-जाने के लिए Uber है, अच्छे कैफे हैं, वीकेंड प्लान्स हैं. आपके आसपास देखो तो सारे 21-22 साल के लड़के-लड़कियां दिखेंगे. कोई नया स्टार्टअप कर रहा है, कोई 19 साल में फंडिंग ले आया है, कोई गूगल में इंटर्न है. इस भीड़ में आप खुद को 27 साल की उम्र में भी बूढ़ा महसूस करने लगते हो. ऐसा लगता है जैसे लाइफ का सबसे अच्छा टाइम तो निकल गया और आप पीछे रह गए.
क्यों अलग है ये दुनिया?हर वक्त एक रेस लगी हुई है. दूसरों से आगे निकलने की, ज्यादा कमाने की, ज्यादा कूल दिखने की. इसी चक्कर में आप अकेले पड़ जाते हो. हजारों लोगों के बीच में भी एक अजीब सी घुटन और अकेलापन महसूस होता है. पैसा बैंक में है, पर मन में शांति नहीं है. आप थके हुए हो, और आपको खुद ही नहीं पता क्यों. आप बेंगलुरु छोड़कर किसी पहाड़ी गांव में आ गए हो. आपका एक छोटा सा प्यारा सा 1BHK है. खिड़की से सीधे बर्फ वाले पहाड़ दिखते हैं. सुबह-सुबह शोर नहीं, पक्षियों की आवाज से नींद खुलती है.
यहां आपकी कमाई बेंगलुरु वाले दोस्तों के मुकाबले आधी भी नहीं है. कोई 40 लाख का पैकेज नहीं, कोई लग्जरी नहीं. आप Uber में नहीं, अपनी पुरानी स्कूटी पर घूमते हो, या कई बार तो पैदल ही निकल जाते हो. शाम को खुद मार्केट जाकर सब्जी लाते हो, दुकान वाले भैया से दो मिनट बात कर लेते हो. लाइफ बहुत सिंपल है. यहां आपको कोई जज नहीं करता. कोई नहीं पूछता कि तुम्हारा पैकेज कितना है या तुमने कितने साल में कितना ग्रोथ किया. यहाँ 21 साल का लड़का भी आपका दोस्त है और 60 साल के अंकल भी. यहाँ उम्र से सक्सेस नहीं नापी जाती.
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इसी वजह से 27 की उम्र में आपको बूढ़ा नहीं, बल्कि जवान फील होता है. आपको लगता है कि अरे, असली जिंदगी तो अब शुरू हुई है. आप खुश हो, रिलैक्स हो, प्रेजेंट में जी रहे हो. कोई फालतू का प्रेशर नहीं, कोई दिखावा नहीं. अर्जव कहते हैं कि उन्होंने ये बात पहाड़ों में 4 महीने रहकर सीखी है. हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी खुशी हमारी सैलरी, हमारी जॉब या हमारे टाइटल पर डिपेंड करती है. लेकिन सच ये है कि हमारी खुशी इस बात पर डिपेंड करती है कि हम कहाँ रह रहे हैं और किन लोगों के बीच हैं.
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