भारत की रिफाइनरीज रूस के तेल एक्सपोर्टर्स की मदद कर रही हैं और भारी मात्रा में कच्चा तेल दक्षिण एशियाई देश में पहुंचाया जा रहा है. ब्लूमबर्ग के डेटा के मुताबिक, पिछले महीने भारत के बंदरगाहों पर मॉस्को का रोजाना 23 लाख बैरल से ज्यादा तेल उतारा गया और जुलाई में भी अब तक सप्लाई इसी स्तर के करीब रही है. यह आंकड़ा यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले लगभग शून्य था और इससे समुद्र में जमा हो रहे रूसी तेल के कार्गो को कम करने में मदद मिल रही है.
रूस के कई बड़े प्रोड्यूसर्स का एक्सपोर्ट अभी भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में है, लेकिन इससे खरीदार पीछे हटते नहीं दिख रहे हैं. जब पिछले साल के आखिर में ये प्रतिबंध लागू किए गए थे, तो उम्मीद थी कि सप्लाई में भारी गिरावट आएगी. लेकिन बिचौलियों के इस्तेमाल से शिपमेंट में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. यह भारी सप्लाई ऐसे समय में आई है जब पर्शियन गल्फ से सप्लाई में कमी आई है, और इसे रूस के बढ़ते एक्सपोर्ट और गिरती कीमतों से बढ़ावा मिला है.
दुनिया के सबसे अहम प्रोडक्शन इलाके, मिडिल ईस्ट से एक्सपोर्ट में फिर से गिरावट आई है, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौते के बाद इसमें कुछ समय के लिए सुधार के संकेत दिखे थे. लेकिन यह समझौता एक महीने के भीतर ही टूट गया, जिससे होर्मुज स्ट्र स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान के हमले फिर से शुरू हो गए और अमेरिका ने नौसैनिक नाकेबंदी फिर से लागू कर दी. हाल ही में, यमन में हूथी विद्रोहियों की ओर से सऊदी बंदरगाहों पर आने वाले जहाजों पर हमले की धमकियों ने सऊदी अरब के रेड सी बंदरगाहों से होने वाले शिपमेंट को खतरे में डाल दिया है, जो गल्फ से होने वाली सप्लाई का एक अहम विकल्प बन गए हैं.
प्रोडक्शन में गिरावट, लेकिन शिपमेंट बढ़ाब्लूमबर्ग के टैंकरमूवमेंट डेटा के मुताबिक, रूस से समुद्र के रास्ते होने वाले कच्चे तेल के शिपमेंट का चार हफ्ते का औसत इस महीने के पहले हफ्ते में देखे गए अब तक के सबसे ऊंचे स्तर के करीब बना हुआ है, भले ही 19 जुलाई तक की अवधि में यह लगातार दूसरे हफ्ते थोड़ा घटकर 41.6 लाख बैरल रोजाना हो गया. यूक्रेन की ओर से रूस की रिफाइनरीज पर लगातार हमलों के कारण, देश में प्रोसेस न हो पाने वाले कच्चे तेल की कुछ सप्लाई शायद एक्सपोर्ट की ओर मुड़ रही है, जिससे तेल प्रोडक्शन में गिरावट के बावजूद रूस का विदेशी शिपमेंट बढ़ रहा है.
पिछले हफ्ते कीव के ड्रोन ने मॉस्को के उत्तरपूर्व में यारोस्लाव में स्थित 3 लाख बैरल रोजाना की क्षमता वाली यानोस रिफाइनरी पर हमला किया था. जुलाई में अब तक हुए हमलों की वजह से रूस में तेल रिफाइनिंग का काम पिछले 21 सालों से भी ज्यादा समय के निचले स्तर पर आ गया है. इससे देश में फ्यूल की कमी और बढ़ गई है और मॉस्को को घरेलू बाज़ार में फ्यूल की लगातार सप्लाई बनाए रखने के लिए इंपोर्टेड फ्यूल पर सब्सिडी को मंजूरी देनी पड़ी है.
अमेरिकी टैरिफ का डररूसी कच्चे तेल की गिरती कीमतों ने भी भारतीय खरीदारों को आकर्षित किया होगा. पिछले 13 हफ्तों में हर हफ्ते इसकी कीमतों में गिरावट आई है और अब इसकी कीमत अप्रैल के मध्य में अपने सबसे ऊंचे स्तर पर रही कीमत की आधी से थोड़ी ही ज्यादा है. साल की शुरुआत में, अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से कुछ भारतीय रिफाइनर ने मॉस्को से कच्चा तेल खरीदने से परहेज किया था.
यह हिचकिचाहट फिर से लौट सकती है, क्योंकि अमेरिकी सीनेटरों का एक द्विदलीय समूह जल्द ही रूस पर प्रतिबंध लगाने वाला बिल सदन में पेश करने की उम्मीद कर रहा है. यह बिल रूसी कच्चे तेल और नेचुरल गैस के टॉप पांच खरीदारों को निशाना बनाएगा और उन पर 100 फीसदी तक टैरिफ दरें लागू करेगा. हालांकि, यह देखना बाकी है कि क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ये शुल्क लागू करेंगे, जबकि अमेरिका और भारत के बीच व्यापार वार्ता चल रही है.
कच्चे तेल की शिपमेंट19 जुलाई तक के 28 दिनों में रूस के एशियाई ग्राहकों को होने वाली शिपमेंट थोड़ी कम होकर 3.89 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गई, जबकि 12 जुलाई तक की अवधि में यह संशोधित 3.95 मिलियन बैरल प्रति दिन थी. हालांकि हाल के हफ्तों में भारत के लिए डेस्टिनेशन दिखाने वाले टैंकरों पर रूसी कच्चे तेल की मात्रा में भारी गिरावट आई है, लेकिन जिन जहाजों ने अभी तक फाइनल डेस्टिनेशन नहीं दिखाया है.
उन पर तेल की मात्रा काफी बढ़ गई है, जिससे समय के साथ इस पैटर्न के उलटने की संभावना है. टैंकर अक्सर अरब सागर पार करने तक स्वेज या पोर्ट सूडान जैसे बीच के डेस्टिनेशन दिखाते हैं, जबकि कुछ जहाज अनलोडिंग के लिए रुकने के बाद भी कभी फाइनल डेस्टिनेशन नहीं दिखाते.
19 जुलाई तक के चार हफ्तों में चीनी बंदरगाहों के लिए जाने वाले टैंकरों पर सप्लाई 1.06 मिलियन बैरल प्रति दिन थी, जो 12 जुलाई तक की अवधि के संशोधित 1.1 मिलियन बैरल प्रति दिन से कम है. भारत जाने वाले टैंकरों पर लगभग 840,000 बैरल प्रति दिन तेल था, जो पिछली अवधि के 1.43 मिलियन बैरल प्रति दिन से कम है.
लेकिन ऐसे जहाजों पर 1.99 मिलियन बैरल प्रति दिन के बराबर तेल है जिन्होंने अभी तक फाइनल डेस्टिनेशन नहीं दिखाया है. इसमें से लगभग 1.67 मिलियन बैरल प्रति दिन तेल रूस के पश्चिमी बंदरगाहों से आने वाले उन जहाजों पर है जिनका डेस्टिनेशन सिंगापुर, पोर्ट सईद या स्वेज नहर दिखाया गया है, या प्रशांत बंदरगाहों से आने वाले उन जहाजों पर है जिनका डिलीवरी पॉइंट स्पष्ट नहीं है.
इसके अलावा 320,000 बैरल प्रति दिन तेल उन टैंकरों पर है जिन्होंने अभी तक किसी डेस्टिनेशन का संकेत नहीं दिया है. 12 जुलाई तक के चार हफ्तों में तुर्की को होने वाली सप्लाई लगभग 160,000 बैरल प्रति दिन पर स्थिर रही, जो लगभग तीन महीनों में सबसे अधिक है.
सीरिया के लिए चार हफ्तों की सप्लाई औसतन लगभग 30,000 बैरल प्रति दिन रही, जो 12 जुलाई तक की अवधि के संशोधित 60,000 बैरल प्रति दिन से कम है. लेकिन जहाजों के डेस्टिनेशन स्पष्ट होने पर इस आंकड़े में बदलाव हो सकता है. सीरिया तक रूसी कच्चा तेल ले जाने वाले टैंकर शायद ही कभी अपनी मंजिल के बारे में संकेत देते हैं.
आमतौर पर, जब वे क्रीट के दक्षिण में होते हैं, तो ऑटोमेटेड ट्रैकिंग सिस्टम से गायब हो जाते हैं. इससे बानियास बंदरगाह पर जहाजों के पहुंचने से पहले तेल के बहाव का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है, जहां उन्हें अक्सर सैटेलाइट तस्वीरों में देखा जा सकता है.