Gurugram News: दिल्ली से सटे हाईटेक शहर गुरुग्राम से एक बेहद हैरान और सोचने पर मजबूर कर देने वाला मामला सामने आया है. यहां 40 लाख रुपये सालाना (करीब 3.33 लाख रुपये महीना) कमाने वाला और बीएमडब्ल्यू (BMW) कार से घूमने वाला एक शख्स खुद को बेहद गरीब समझता है. इतना ही नहीं, अपनी इस ‘गरीबी’ के तनाव के कारण वह रात भर सो भी नहीं पाता है. सुनने में यह बात भले ही अजीब और काल्पनिक लगे, लेकिन आज के दौर के कॉर्पोरेट और कामकाजी प्रोफेशनल्स के बीच यह एक कड़वी हकीकत बनती जा रही है. एवरहोप ऑन्कोलॉजी के को-फाउंडर और चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. सनी गर्ग ने सोशल मीडिया पर इस दिलचस्प और आंखें खोल देने वाले वाकये को साझा किया है.
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, डॉ. सनी गर्ग बताते हैं कि पिछले हफ्ते उनके क्लिनिक में 34 साल का एक प्रोफेशनल आया, जो गुरुग्राम के एक प्राइम इलाके में 2BHK फ्लैट में रहता है. वह शानदार सैलरी पैकेज पर है और बीएमडब्ल्यू कार से चलता है. डॉक्टर ने खुलासा किया कि वह शख्स उनके सामने बैठा और बेहद गंभीर होकर बोला, ‘डॉक्टर, मुझे लगता है कि मैं बहुत गरीब हूं. मुझे इस बात की चिंता में रात भर नींद नहीं आती.’
डॉक्टर ने कहा, ‘मैं उसकी इस बात पर हंसा नहीं, क्योंकि यह सिर्फ एक अकेले इंसान की कहानी नहीं है. यह आज के भारतीय मिडिल-क्लास और अपर-मिडिल क्लास प्रोफेशनल्स की वह कड़वी हकीकत है, जिसके बारे में समाज में शायद ही कोई खुलकर बात करता है.’
बदल गया है ‘अमीरी’ और ‘गरीबी’ का पैमाना: क्या है मॉडर्न पॉवर्टी?
डॉ. गर्ग ने इस मानसिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए बताया कि अगर आंकड़ों और अर्थव्यवस्था के नजरिए से देखा जाए, तो 40 लाख रुपये सालाना कमाने वाला यह शख्स भारत के टॉप 1% सबसे अमीर लोगों की सूची में शामिल है. इसके बावजूद वह खुद को गरीब समझ रहा है, क्योंकि अब समाज में तुलना करने का आधार यानी ‘रेफरेंस पॉइंट’ पूरी तरह बदल चुका है.
डॉक्टर के अनुसार, पहले के समय में एक आम इंसान अपनी तुलना अपने गांव या मोहल्ले के उस पड़ोसी से करता था जिसका बेटा कोई साधारण नौकरी करता था. लेकिन आज का युवा खुद की तुलना लिंक्डइन (LinkedIn) या इंस्टाग्राम पर मौजूद उस 28 साल के लड़के से करता है, जिसने अपना कोई स्टार्टअप करोड़ों में बेच दिया और आज 80 करोड़ रुपये की नेटवर्थ पर बैठा है. यही आज के दौर की ‘आधुनिक गरीबी’ (Modern Poverty) है. इसमें इंसान की आमदनी तो बढ़ती है, लेकिन उसकी अपेक्षाएं और दूसरों को देखने की चाहत 10 गुना ज्यादा तेज रफ्तार से भागती है.
ये भी पढ़ें: खुदाई में मिला मुगलकालीन घड़ा, छूते ही टूटा चांदी का खजाना देख चौंधिया गईं लोगों की आंखें
डॉक्टर के वो सवाल, जिन्होंने झकझोर कर रख दिया
शख्स की इस मानसिक उलझन और डिप्रेशन को दूर करने के लिए डॉ. गर्ग ने उससे बेहद बुनियादी लेकिन जरूरी सवाल पूछे:
सवाल 1: पिछले एक साल में तुमने कितनी बार खुद से यह कहा कि ‘मैं जहां हूं और मेरे पास जो कुछ भी है, वो मेरे लिए काफी है’?
जवाब: शख्स ने सिर झुकाकर कहा, ‘कभी नहीं.’
सवाल 2: तुम यह दिन-रात भागकर इतना सारा पैसा आखिर किसके लिए और क्यों कमा रहे हो?
जवाब: शख्स ने ईमानदारी से माना कि ‘वह खुद भी नहीं जानता.’ वह बस इस अंधी दौड़ में इसलिए भाग रहा है क्योंकि उसके आसपास के सभी लोग आगे निकल रहे हैं.
पैसा कमाने की मशीन बन गया है आज का इंसान
डॉ. गर्ग ने बताया कि इन जवाबों से साफ हो गया कि वह शख्स आर्थिक रूप से कमजोर नहीं था, बल्कि वह जीवन के असली अर्थ, परिवार से जुड़ाव, संतोष और मानसिक शांति के मामले में गरीब हो चुका था. डॉक्टर ने आज की युवा पीढ़ी को चेतावनी देते हुए कहा कि जब पैसा ही आपकी जिंदगी की हर गतिविधि और खुशी का इकलौता पैमाना बन जाता है, तो आप एक इंसान नहीं रह जाते, बल्कि केवल एक मशीन बनकर रह जाते हैं. बैंक खाते में जमा केवल मोटी रकम कभी भी आपके जीवन के उद्देश्य की कमी और मानसिक अकेलेपन को पूरा नहीं कर सकती.