पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली में शांति भंग की धाराओं के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और बिना वैधानिक प्रक्रिया के किसी निर्दोष को जेल नहीं भेजा जा सकता. न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मंसूर अहमद उर्फ लल्लू की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की.
कोर्ट ने मंसूर अहमद को 8 दिनों की अवैध हिरासत के लिए 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. यह राशि दोषी तत्कालीन एसीपी की सैलरी से वसूली जाएगी.
घटना क्या थी?प्रयागराज के खीरी इलाके के रहने वाले मंसूर अहमद को बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के उठाया गया. मात्र एक प्रोफार्मा आदेश पर उन्हें सीधे जेल भेज दिया गया. हाई कोर्ट ने इस पूरी कार्रवाई को पूरी तरह अवैध करार दिया. कोर्ट ने कहा कि आठ दिन की यह हिरासत किसी भी मायने में कानून के अनुरूप नहीं थी.
हजारों निर्दोषों की अवैध हिरासत का खुलासाखंडपीठ ने इस मामले में गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि गाजियाबाद, प्रयागराज समेत कई जिलों में पुलिस कमिश्नरों और मजिस्ट्रेटों द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग कर हजारों नागरिकों को जेलों में बंद रखा गया. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रयागराज द्वारा उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड्स से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए.
कुल 2,325 लोग इस तरह की एहतियाती कार्रवाई में हिरासत में लिए गए. कई लोगों को एक हफ्ते से लेकर 20 दिनों तक जेल में रखा गया.
कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर प्रयागराज को 14 सितंबर 2026 तक इस आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है. खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी कानून का पालन कराना है, न कि अपनी मर्जी से लोगों की आजादी छीनना. यह फैसला उन सभी मामलों में मिसाल बनेगा जहां शांति भंग की धाराओं का दुरुपयोग कर निर्दोषों को परेशान किया जा रहा था.