75 साल की मां ने बेटी को दी नई जिंदगी, किडनी डोनेट कर बचाई जान… Mother's Day पर पढ़ें दिल छूने वाली ये कहानी
TV9 Bharatvarsh May 10, 2026 03:43 PM

कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं हो सकता, इसलिए उसने मां बनाई. लेकिन जब विज्ञान के हाथ खड़े हो जाएं और उम्र की सीमाएं दीवार बन जाएं, तब मां का संकल्प एक चमत्कार बन जाता है. मदर्स डे के मौके पर मध्य प्रदेश सागर जिले के शाहगढ़ से एक ऐसी दास्तां सामने आई है जो न केवल प्रेरणादायक है बल्कि यह साबित करती है कि मां के कलेजे से बड़ा कोई रक्षक इस दुनिया में नहीं है. यह कहानी है 75 वर्षीय मनोरमा असाटी की, जिन्होंने अपनी 40 वर्षीय बेटी कंचन को मौत के मुंह से बाहर निकालने के लिए अपनी उम्र की परवाह किए बिना किडनी दान कर दी.

कंचन असाटी की जिंदगी में परेशानियों का दौर करीब 10 साल पहले उस समय शुरू हुआ, जब प्रेग्नेंसी के दौरान उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी. इलाज के दौरान जांच में पता चला कि उनकी दोनों किडनियां धीरे-धीरे काम करना बंद कर रही हैं. इसके बाद उनका जीवन अस्पतालों के चक्कर और लंबे इलाज तक सिमट गया. बेहतर उपचार की उम्मीद में उन्होंने दिल्ली, हरियाणा, इंदौर और गुजरात तक इलाज कराया, लेकिन इस दौरान उनका क्रिएटिनिन और यूरिया स्तर लगातार खतरनाक सीमा तक पहुंचता गया. आखिरकार डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि किडनी ट्रांसप्लांट के बिना उनकी जिंदगी बचाना संभव नहीं है.

मां ने जताई किडनी देने की इच्छा

इसी संघर्ष के बीच साल 2024 में कंचन के पति डॉ. अमित आनंद असाटी का हृदय गति रुकने से आकस्मिक निधन हो गया. दो मासूम बच्चों 19 वर्षीय कौस्तुभ और 11 वर्षीय कौटिल्य के सिर से पिता का साया उठ गया और कंचन पूरी तरह डायलिसिस के सहारे जीने को मजबूर हो गईं. बेटी को हर दिन तिल-तिल मरता देख 75 साल की बुजुर्ग मां मनोरमा का दिल पसीज गया. और इसी बीच मां ने अपनी किडनी देने की इच्छा जताई.

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मां की बात सुनकर परिवार के अन्य करीब 10 सदस्यों और रिश्तेदारों के टेस्ट कराए गए, लेकिन किसी की किडनी मैच नहीं हुई. अंत में जब मनोरमा असाटी की जांच हुई, तो रिपोर्ट पॉजिटिव आई. हालांकि उम्र का पड़ाव सबसे बड़ी चुनौती था. डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि 75 वर्ष की आयु में सर्जरी करना मां और बेटी दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है. लेकिन मां का हौसला अडिग था. उन्होंने साफ शब्दों में कहा अगर मेरी एक किडनी से मेरी बेटी की सांसें लौट सकती हैं, तो मुझे अपनी जान की कोई फिक्र नहीं.

सफल हुई किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी

भोपाल के एक निजी अस्पताल के डॉक्टरों ने इस चुनौतीपूर्ण मामले को स्वीकार करते हुए कंचन असाटी की जिंदगी बचाने का बीड़ा उठाया. मां मनोरमा की ममता और डॉक्टरों की कुशलता के संगम से सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया गया, जिसने कंचन को नई जिंदगी दी. आज मां मनोरमा और बेटी कंचन दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं. कंचन अब अपने दोनों बच्चों की सामान्य तरीके से परवरिश कर रही हैं और परिवार फिर से खुशहाल जीवन जी रहा है. मेडिकल जगत में इस सफल ट्रांसप्लांट को दुर्लभ साहस और मानवीय संवेदनाओं की मिसाल माना जा रहा है.

आज मदर्स डे पर दमोह की यह कहानी चीख-चीख कर कह रही है कि मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि वह अपने बच्चों की जिंदगी की ढाल होती है. जिस उम्र में लोग दूसरों के सहारे की उम्मीद करते हैं, उस 75 साल की उम्र में मनोरमा जी ने अपनी बेटी को ‘जीवन दान’ देकर यह बता दिया कि ममता के आगे मौत भी घुटने टेक देती है. डॉक्टर इसे मेडिकल सक्सेस कह सकते हैं, लेकिन कंचन के लिए यह उनकी मां का दोबारा दिया हुआ जन्म है.

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